Thursday, September 13, 2018

गणेश चतुर्थी || विस्तृत जानकारी




संक्षिप्त विवरण

गौरीपुत्रगजानंदशिवसुतायविघ्नहर्ता श्री गणेश जी की स्थापना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को की जाती है। यह महोत्सव हर साल अगस्त या सितम्बर में मनाया जाता है। उत्सव आमतौर पर अनंत चतुर्दशी नामक अंतिम दिन होने वाले सबसे बड़े प्रदर्शन के साथ 11 दिनों के लिए मनाया जाता है।


वर्ष (Years)
गणेश स्थापना
(Ganesh Chaturthi)
गणेश विसर्जन
(Anant Chaturdashi)
2018
13-Sep-2018
23-Sep-2018
2019
02-Sep-2019
12-Sep-2019
2020
22-Aug-2020
01-Sep-2020


गणेश चतुर्थी विस्तृत जानकारी

गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाते हैं। इस दिनभगवान की सुंदर मूर्तियों को घरों और सार्वजनिक दोनों जगहों में स्थापित किया जाता है। मूर्ति में शक्ति स्थापित करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा का आव्हान किया जाता हैजिसे सोलह भागों में किया जाता है और ये अनुष्ठान शोडशोपचार पूजा के नाम से जाना जाता है। 

अनुष्ठान के दौरानमिठाईनारियल और फूल सहित विभिन्न प्रसाद मूर्ति को अर्पित किये जाते हैं। यह अनुष्ठान दोपहर के आसपास एक शुभ समय पर किया जाना चाहिएजिसे मध्याहना के नाम से जाना जाता हैजिस समय भगवन गणेश का जन्म हुआ ऐसा माना जाता है। 

परंपरा के अनुसार ऐसा माना जाता हैगणेश चतुर्थी पर कुछ समय के दौरान चंद्रमा को न देखना अच्छा माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति चंद्रमा को देखता हैतो उसे चोरी के आरोपों के साथ शाप दिया जाएगा और समाज द्वारा अपमानित किया जाएगा। जब तक कि वे एक निश्चित मंत्र का जप नहीं करते। 

स्वभवतः हीभगवान श्री कृष्ण पर एक मूल्यवान गहने के चोरी करने का झूठा आरोप लगाया गया था। ऋषि नारद ने कहा कि श्री कृष्ण ने भद्रपद शुक्ल चतुर्थी (जिस अवसर पर गणेश चतुर्थी मनाई जाती हैं) पर चंद्रमा को देखा था और इसके कारण उन्हें शाप दिया गया था। इसीलिए ऐसा माना जाता है की उस दिन चाँद को देखने वाले को भी ऐसा ही शाप लगेगा इस कारण ही उस दिन चाँद को देखने की मनाही होती है।

शाम को आरती के साथ हर दिन भगवान गणेश की मूर्तियों की पूजा की जाती है और ग्यारह दिन पुरे होने के बाद आमतौर पर गणेश की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है। हालांकिबहुत से लोग जो अपने घरों में मूर्ति रखते हैंवे लोग 1.5 दिन , 2.5 दिन , 3 दिन , 5 दिन , 7 दिन , 9 दिन तथा 11 दिनों के लिए भी गणपति की स्थापना करते हैं।


अनंत चतुर्दसी का महत्व क्या है?

आप सोच रहे होंगे कि श्री गणेश की मूर्तियों का विसर्जन इस दिन क्यों समाप्त होता है। यह विशेष क्यों हैसंस्कृत मेंअनंत, अनंत ऊर्जाया अमरत्व को संदर्भित करता है। यह दिन वास्तव में भगवान अनंत की पूजाभगवान विष्णु के अवतार (जीवन के संरक्षक और संयोजकजिसे सर्वोच्च भी कहा जाता है) की पूजा के लिए समर्पित है। चतुर्दशी का मतलब है "चौदहवें"। इस मामले मेंयह अवसर हिंदू कैलेंडर पर भद्रपद के महीने के दौरान चंद्रमा कला के 14 वें दिन पड़ता है।


Monday, March 12, 2018

रविवार व्रत विधि एवं कथा

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किसी ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने हेतु उससे संबंधित वस्तुओं का दान, जप तथा व्रत करने का विधान है। किसी ग्रह की शांति कराने या उसकी शुभता प्राप्त करने के लिए उससे संबंधित वार को व्रत किया जाता है। यदि किसी ग्रह की दशा, महादशा, अंतर्दशा, जन्मांक और गोचराष्टक वर्ग में से कोई अनिष्टकारी- हो तो उस ग्रह की शांति के लिए वार के अनुसार व्रत करने का विधान है। सप्ताह के प्रत्येक वार का काल सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रहता है।

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रविवार व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। सूर्य प्रकाश, आरोग्य, प्रतिष्ठाद- ि देते हैं तथा अरिष्टों का निवारण भी करते हैं। नवग्रह शांति विधान में भी केवल सूर्योपासन- ा से सभी ग्रह की शांति हो जाती है, क्योंकि ये नवग्रहों के राजा हैं। इस हेतु माह वैशाख, मार्गशीर्ष- और माघ श्रेष्ठ हैं। उक्त में से किसी भी माह के प्रथम रविवार (शुक्ल पक्ष) से इस व्रत को संकल्प लेकर प्रारंभ करना चाहिए। यह व्रत एक वर्ष अथवा १२ या ३० रविवार तक करे ।

रविवार व्रत विधान – 

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प्रातः काल स्नानोपरां- त रोली या लाल चंदन, लाल पुष्प, अक्षत, दूर्वा मिश्रित जल आदि से सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। भोजन के पूर्व स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर निम्न मंत्र बोलते हुए पुनः अघ्र्य दें- नमः सहस्रांशु सर्वव्याधि- विनाशन/गृह- णाघ्र्यमय- दत्तं संज्ञा सहितो रवि।।

अघ्र्- य देने के पूर्व ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ मंत्र का कम से कम पांच माला (या यथा शक्ति) जप करना चाहिए। लाल चंदन, कुमकुम या रोली का तिलक लगाकर रविवार व्रत कथा पढ़ें।

इस व्रत में इलायची मिश्रित गुड़ का हलवा, गेहूं की रोटियां या गुड़ से निर्मित दलिया सूर्यास्त के पूर्व भोजन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। यदि निराहार रहते हुए सूर्य छिप जाये तो दुसरे दिन सूर्य उदय हो जाने पर अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करें । भोजन में सर्वप्रथम सात कौर गुड़ का हलवा या दलिया और फिर अन्य पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। भोजन के पूर्व हलवा या दलिया का कुछ भाग देवस्थान या देव-दर्शन को आए बालक-बालिक- ओं को देना चाहिए। नमक – तेलयुक्त भोजन का प्रयोग न करे।

अंतिम रविवार को आम या अर्क की समिधा से हवन कर ब्राह्मण व ब्राह्मणी को भोजन कराएं और वस्त्र, दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लें। ब्रह्मचर्य- व्रत का पालन करते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ सूर्य का व्रत करने से सभी मनोकामनाओं- की पूर्ति होती है। इससे न केवल शत्रु पर विजय की प्राप्त होती है, बल्कि संतान प्राप्ति के भी योग बनते हैं। साथ ही नेत्र व्याधि, चर्म रोग, कुष्ठ रोगादि दूर होते हैं। यह व्रत आरोग्य, सौभाग्य और दीर्घायु भी देता है।

रविवार (इतवार) व्रत कथा

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प्राचीन- काल में कंचनपुर में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रवि वार का व्रत कर रही थी। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर अपने घर के आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती थी। उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए, रविवार व्रत कथा सुन कर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती थी। सूर्य भगवान की अनुकम्पा से बुढ़िया को किसी प्रकार की कोई चिन्ता व कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी-समृद्- होते देखकर उसकी पड़ोसन उससे बुरी तरह जलने लगी थी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यास- सो गई। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और उससे व्रत न करने तथा उन्हें भोग न लगाने का कारण पूछा। बुढ़िया ने बहुत ही करुण स्वर में पड़ोसन के द्वारा घर के अन्दर गाय बांधने और गोबर न मिल पाने की बात कही। सूर्य भगवान ने अपनी अनन्य भक्त बुढ़िया की परेशानी का कारण जानकर उसके सब दुःख दूर करते हुए कहा, “हे माता! तुम प्रत्येक रविवार को मेरी पूजा और व्रत करती हो। मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं और तुम्हें ऐसी गाय प्रदान करता हूं जो तुम्हारे घर-आंगन को धन-धान्य से भर देगी। तुम्हारी सभी मनोकामनाएं- पूरी होंगी। रविवार का व्रत करनेवालों की मैं सभी इच्छाएं पूरी करता हूं। मेरा व्रत करने व कथा सुनने से बांझ स्त्रियों को पुत्र की प्राप्ति होती है। निर्धनों के घर में धन की वर्षा होती है। शारीरिक कष्ट नष्ट होते हैं। मेरा व्रत करते हुए प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है।” स्वप्न में उस बुढ़िया को ऐसा वरदान देकर सूर्य भगवान अन्तर्धान हो गए।

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प्रातःक- ाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुन्दर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुन्दर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरन्त उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी। बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाक- उस नगर के राजा के पास भेज दिया। राजा को जब बुढ़िया के पास सोने के गोबर देने वाली गाय के बारे में पता चला तो उसने अपने सैनिक भेजकर बुढ़िया की गाय लाने का आदेश दिया। सैनिक उस बुढ़िया के घर पहुचे। उस समय बुढ़िया सूर्य भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन ग्रहण करने वाली थी। राजा के सैनिकों ने गाय और बछड़े को खोला और अपने साथ महल की ओर ले चले। बुढ़िया ने सैनिकों से गाय और उसके बछड़े को न ले जाने की प्रार्थना की, बहुत रोई-चिल्ला- , लेकिन राजा के सैनिक नहीं माने। गाय व बछड़े के चले जाने से बुढ़िया को बहुत दुःख हुआ। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया और सारी रात सूर्य भगवान से गाय व बछड़े को लौटाने के लिए प्रार्थना करती रही।

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सुन्दर- गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यास- बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन! बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरन्त लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों- का पहाड़ टूट पड़ेगा। तुम्हारे राज्य में भूकम्प आएगा। तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया। राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा भी मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दण्ड भी दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुर- ष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए। चारों ओर खुशहाली छा गई। सभी लोगों के शारीरिक कष्ट दूर हो गए। निस्सन्तान- स्त्रियों को पुत्रों की प्राप्ति होने लगी। राज्य में सभी स्त्री-पुर- ष सुखी जीवन-यापन करने लगे।

रविवा- की आरती
कहुँ लगि आरती दास करेंगे, सकल जगत जाकि जोति विराजे ।। टेक
सात समुद्र जाके चरण बसे, कहा भयो जल कुम्भ भरे हो राम ।
कोटि भानु जाके नख की शोभा, कहा भयो मन्दिर दीप धरे हो राम ।
भार उठारह रोमावलि जाके, कहा भयो शिर पुष्प धरे हो राम ।
छप्पन भोग जाके नितप्रति लागे, कहा भयो नैवेघ धरे हो राम ।
अमित कोटि जाके बाजा बाजे, कहा भयो झनकार करे हो राम ।
चार वेद जाके मुख की शोभा, कहा भयो ब्रहम वेद पढ़े हो राम ।
शिव सनकादिक आदि ब्रहमादिक, नारद मुनि जाको ध्यान धरें हो राम ।
हिम मंदार जाको पवन झकेरिं, कहा भयो शिर चँवर ढुरे हो राम ।
लख चौरासी बन्दे छुड़ाये, केवल हरियश नामदेव गाये ।। हो रामा ।

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शनिवार व्रत विधि एवं कथा

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शनिवार का व्रत करने से शनि और राहु की शांति होती है. शनि की शांति हेतु कम से कम 19 व्रत एवं राहु की शांति के लिए 18 व्रत किए जाते हैं. यह व्रत मनस्ताप, रोग, शोक, भय, बाधा आदि से मुक्ति एवं शनि जन्य पीड़ा के निवारण के लिए विशेष रूप से फलदायक होता है. शनिवार के दिन प्रातः स्नानादि करने के बाद काला तिल और लौंग मिश्रित जल पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पीपल वृक्ष पर चढाएं. तत्पश्चात शिवोपासना या हनुमत आराधना और साथ ही शनि की लौह प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए. फिर शनिवार व्रत कथा का पाठ करना चाहिए. उड़द के बने पदार्थ बूढ़े ब्राह्मण को देना चाहिए और स्वयं सूर्यास्त के पश्चात भोजन ग्रहण करना चाहिए. भोजन के पूर्व शनि की शांति हेतु ‘शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का और राहु की शांति ‘हेतु ‘रां राहवे नमः’ मंत्र का तीन-तीन माला जप करना चाहिए. शनि के व्रत की पूर्णाहुति हेतु शमीकाष्ठ से हवन करें. राहु के व्रत की पूर्णाहुति हेतु हवन में दूर्वा का उपयोग करना चाहिए.
शनिवार व्रत विधि: 

शनि देव की पूजा शनिवार के दिन होती है. इनकी पूजा काला तिल, काला वस्त्र, तेल, उड़द के द्वारा की जाती है. यह वस्तुएं शनि देव को बहुत प्रिय है. शनि की दशा को दूर करने के लिए यह व्रत किया जाता है. इनके प्रकोप में से बचने के लिए शनि सत्रोत का पाठ विशेष लाभदायक सिद्ध होता है.

शनिवार व्रत कथा: 

एक बार स्वर्गलोक में इस प्रश्न पर नौ ग्रहों में वाद-विवाद हो गया कि 'सबसे बड़ा कौन?' है. विवाद इतना बढ़ गया कि परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई. निर्णय के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुँचे और बोले- 'हे देवराज! आप यह निर्णय कीजिए कि हममें से सबसे बड़ा कौन है?' देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए. इंद्र बोले- 'मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ. हम सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं. इसका प्रश्न का समाधान वही बताएंगें. देवराज इंद्र सहित सभी देवता उज्जयिनी नगरी पहुँचे. राजा विक्रमादित्य ने महल में सभी देवताओं का स्वागत किया और आने का कारण पूंछा. तब देवताओं ने राजा विक्रमादित्य से अपना प्रश्न पूछा. प्रसुन सुनकर राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे क्योंकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान थे. किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुँच सकती थी. अचानक राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत (चाँदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे के नौ आसन बनवाए. धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा. देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा- 'आपका निर्णय तो स्वयं हो गया. जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वही सबसे बड़ा है.' राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा- 'राजा विक्रमादित्य! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है. तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो. मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा.' शनि ने कहा- 'सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं, लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष (साढ़े साती) तक रहता हूँ. बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है. राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा. राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा.' इसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ चले गए, परंतु शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहाँ से विदा हुए. राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे. उनके राज्य में सभी स्त्री-पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे. कुछ दिन ऐसे ही बीत गए. उधर शनि देवता अपने अपमान को भूले नहीं थे. राजा विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्जयिनी नगरी पहुँचे. राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा. घोड़े बहुत कीमती थे. अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा विक्रमादित्य ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया. घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुए तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा. तेजी से दौड़ता घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहाँ गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया. राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगे लेकिन उन्हें लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला. राजा विक्रमादित्य भूख और प्यास से तड़पने लगे. बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला. राजा ने उससे पानी माँगा. पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अँगूठी दे दी. फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से निकलकर पास

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के नगर में पहुँचा.  राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया. उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्जयिनी नगरी से आया हूँ. राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई. सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और खुश होकर उसे भोजन कराने के लिए अपने घर ले गया. सेठ के घर में सोने का एक हार खूँटी पर लटका हुआ था. राजा को उस कमरे में छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया. तभी देखते ही देखते उस खूंटी ने सोने का हार निगल लिया. एक आश्चर्यजनक घटना घटी. यह देखकर राजा बहुत ही आश्चर्य चकित हुआ. सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का संदेह राजा पर ही किया क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था. सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बाँधकर नगर के राजा के पास ले चलो. राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूँटी ने हार को निगल लिया था. इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटने का आदेश दे दिया. राजा विक्रमादित्य के हाथ-पाँव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया. कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया. राजा आवाज देकर बैलों को हाँकता रहता. इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा. शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ऋतु प्रारंभ हुई. राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी. उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गाने वाले को बुला लाने को कहा. दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया. राजकुमारी उसके मेघ मल्हार से बहुत मोहित हुई. अतः उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया.

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 राजकुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गए. रानी ने मोहिनी को समझाया- 'बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है. फिर तू उस अपंग से विवाह करके अपने पाँव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?' राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी. अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया. आखिर राजा-रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा. विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे. उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा- 'राजा तुमने मेरा प्रकोप देख लिया. मैंने तुम्हें अपने अपमान का दंड दिया है.' राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की- 'हे शनिदेव! आपने जितना दुःख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना.' शनिदेव ने कुछ सोचकर कहा- 'राजा! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ. जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत करके मेरी व्रतकथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी. प्रातःकाल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पाँव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई. उसने मन ही मन शनिदेव को प्रणाम किया. राजकुमारी भी राजा के हाथ-पाँव सही-सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई.

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तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी सुनाई. सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुँचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा. राजा ने उसे क्षमा कर दिया क्योंकि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था. सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया. भोजन करते समय वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना घटी. सबके देखते-देखते उस खूँटी ने हार उगल दिया. सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया. राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्जयिनी पहुँचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया. अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं. प्रत्येक स्त्री-पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रतकथा अवश्य सुनें. राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए. शनिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएँ शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं. सभी लोग आनंदपूर्वक रहने लगे.

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आरती:
चार भुजा तहि छाजै, गदा हस्त प्यारी | जय ०
रवि नंदन गज वंदन,यम अग्रज देवा |
कष्ट न सो नर पाते, करते तब सेना | जय ०
तेज अपार तुम्हारा, स्वामी सहा नहीं जावे |
तुम से विमुख जगत में,सुख नहीं पावे | जय ०
नमो नमः रविनंदन सब ग्रह सिरताजा |
बंशीधर यश गावे रखियो प्रभु लाज | जय ०
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बुधवार व्रत विधि एवं कथा

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बुधवार के देवता भगवान शिव या बुध देव हैं. बुधवार का व्रत विशाखा नक्षत्र में बुधवार के दिन से आरंभ करना चाहिए. इसे 17 या 21 सप्ताह तक करना चाहिए. इस योग के न मिलने की स्थिति में इस व्रत को किसी भी माह में शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से प्रारंभ किया जा सकता है.

व्रत विधि 

व्रत प्रारम्भ करने के दिन व्रती को प्रातः उठकर संपूर्ण घर की सफाई करनी चाहिए. तत्पश्चात स्नानादि से निवृत्त होकर संपूर्ण घर को पवित्र करने के उद्देश्य से गंगा जल का घर भर में छिड़काव करना चाहिए. उसके बाद घर के ईशान कोण में भगवान शिव या बुध का चित्र या मूर्ति कांस्य के बर्तन में स्थापित करना चाहिए. उनपर बेलपत्र, अक्षत, धूप और घी का दीपक जलाकर विधिवत पूजा करनी चाहिए.


इसके बाद निम्नलिखित मंत्र से भगवान बुध की प्रार्थना करें:

‘बुध त्वं बुद्धिजनको बोधदः सर्वदा नृणाम्‌. तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नमः’॥ 

बुधवार की व्रतकथा सुनकर आरती करें. इसके पश्चात गुड़, भात और दही का प्रसाद बाँटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें.

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व्रत कथा 

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था. वह बहुत धनवान था. मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की अति सुंदर, रूपवती और गुणवंती लड़की संगीता से हुआ था. एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी संगीता को लेने बुधवार के दिन अपनी ससुराल बलरामपुर गया. मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा. संगीता के माता-पिता मधुसूदन से बोले- 'बेटा, आज बुधवार है. बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते.' परन्तु मधुसूदन नहीं माना. उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही. मधुसूदन के न मानने पर संगीता के माता-पिता ने उसे बिदा कर दिया. दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की. दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया. वहां से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की. रास्ते में संगीता को प्यास लगी. मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया. थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह देखता है कि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा है. यह देखते ही मधुसूदन बुरी तरह परेशान हो गया. संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई. वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई. मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा- 'तुम कौन हो? और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?' मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है. मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ. लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?' मधुसूदन ने चीखते हुए कहा- 'तुम जरूर कोई चोर या ठग हो. यह मेरी पत्नी संगीता है. मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था.' इस पर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो. संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था. मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ. नहीं तो सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा.' दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे. उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए. नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए. सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए. सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया. संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी. राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा. राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा. तभी आकाशवाणी हुई- 'मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया. यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है.' मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि 'हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए. मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई. भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा.' मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया. तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया. राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए. भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया. कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई. बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था. दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए. मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए अपने गांव में आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे. भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी. जल्दी ही उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां भर गईं. बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुष के जीवन में सभी मंगलकामनाएं पूरी होती हैं.

बुधवार व्रत के दिन क्या-क्या करना चाहिए? 
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बुधवार व्रत के दिन भगवान शिव को सफेद फूल तथा हरे रंग की वस्तुएं चढ़ाई जानी चाहिए तथा ब्राह्मणों को भोजन करवाकर यथाशक्ति दान देना चाहिए. इस दिन व्रती को हरे-पीले रंग के कपड़े पहनने चाहिए. इस दिन व्रती को एक समय ही बिना नमक का भोजन करना चाहिए. पन्ना रत्न धारण करना शुभ होता है. व्रतधारी को किसी भी रूप में व्रतकथा को बीच में छोड़कर, प्रसाद ग्रहण किए बिना कहीं नहीं जाना चाहिए. व्रत में हरी वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए. मूंग का हलवा, हरे फल, छोटी इलाइची का विशेष महत्व है.

बुधवार व्रत से लाभ

बुधवार का नियमित व्रत करने से सर्व-सुखों की प्राप्ति होती है. जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता. इससे अनिष्टकारी ग्रहों की शांति होती है. इस व्रत को करने से बुद्धि बढ़ती है.

मंगलवार व्रत विधि एवं कथा

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हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार मंगलवार के दिन हनुमानजी की पूजा होती है। इस दिन मंदिरों में हनुमानजी की विशेष पूजा का आयोजन होता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं ।नारद पुराण के अनुसार मंगलवार के व्रत से भयंकर चिंताओं का अंत होता है। साथ के साथ शनि की महादशा या साढ़ेसाती भी दूर हो जाती है।


मंगलवार व्रत विधि

मंगलवार का व्रत रखने वाले भक्तों को मंगलवार के दिन ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए प्रत्येक मंगलवार को सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाएं स्नान करने के बाद लाल रंग का वस्त्र धारण करने चाहिए | इसके बाद लाल फूल ,लाल सिंदूर ,लाल कपड़े हनुमान जी को चढ़ाने चाहिए और पूरे भक्ति भाव से हनुमान जी के सामने बैठकर दीपक जलाने के बाद हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए |

शाम के समय हनुमान जी को बेसन के लड्डू का भोग लगाकर बिना नमक का भोजन करना चाहिए | खीर का भी भोग लगाया जा सकता है |

मंगलवार के व्रत का फल 

मंगलवार के व्रत के बारे में मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है | उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। और शनि ग्रह से होने वाली परेशानियां भी दूर हो जाती हैं ।मांगलिक दोष वाले जातकों को मंगलवार का व्रत बहुत फायदा करता है।


हिंदू शास्त्रों के अनुसार मंगलवार को भगवान हनुमान जी की पूजा होती है । जो लोग मंगलवार का व्रत रखते हैं उनकी सुख, सम्मान, पुत्र की प्राप्ति जैसी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । आइए पढ़ें मंगलवार की व्रत कथा –

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मंगलवार व्रत कथा 

एक नगर में ब्राह्मण दंपत्ति रहता था | उनके कोई संतान नहीं थी जिसकी वजह से वह बहुत दुखी रहते थे। एक समय ब्राह्मण ने वन वन जाकर हनुमान जी की पूजा करने का निश्चय किया और उसने एक पुत्र प्राप्ति की कामना की | घर पर उसकी पत्नी भी मंगलवार को व्रत रखती थी | व्रत के अंत में हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करती थी।

एक दिन ब्राह्मणी भोजन नहीं बना पाई और भगवान हनुमान जी को भी भोग नहीं लगा सकी। उसने निश्चय किया कि वह अगले मंगलवार तक कुछ ग्रहण नहीं करेगी और वह 6 दिन तक बिना खाए – पिए रही | जब अगला मंगलवार आया तो वह बेहोश हो गई हनुमान जी उसकी त्याग और निष्ठा को देखकर प्रसन्न हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया कि तुझे एक पुत्र की प्राप्ति होगी और वह तेरी बहुत सेवा करेगा। कुछ समय बाद ब्राह्मणी को एक पुत्र प्राप्ति हुई | बालक को पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई उस ने बालक का नाम मंगल रखा।

ब्राह्मण वन से वापस आकर उस बालक को घर पर देखता है और ब्राह्मणी से पूछता है कि यह बालक कौन है? ब्राह्मणी ने बताया मंगलवार के व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने यह बालक दिया है | ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ और ब्राह्मणी बाहर गई हुई थी तो ब्राह्मण ने बालक को कुएं में फेंक दिया।

घर पर लौटने पर ब्राह्मणी ने जब मंगल को घर में नहीं देखा तो वह घबरा गई और ब्राह्मण से पूछा कि मंगल कहां है? तभी मंगल पीछे से मुस्कुरा कर आ गया | उसे वापस देखकर ब्राह्मण बहुत आश्चर्यचकित रह गया | रात को हनुमान जी ने ब्राह्मण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि यह बालक मैंने ही दिया है।

ब्राह्मण को यह सत्य जानकर बहुत खुशी हुई | इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति रोजाना मंगलवार व्रत रखने लगे | जो भी मनुष्य मंगलवार का व्रत निष्ठा और विश्वास से रखता है उसकी सारी मनोकामनाएँ सहज ही पूरी हो जाती हैं |

सोमवार व्रत विधि एवं कथा

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सोमवार का व्रत भगवान भोलेनाथ को समर्पित है | भगवान भोलेनाथ को त्रिदेवों में से एक माना जाता है | शिव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार के व्रत का प्रावधान है | माना जाता है अगर कोई व्यक्ति 16 सोमवार का व्रत पूरे विधि-विधान से करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। सोमवार व्रत विधि जैसा कि नारद पुराण में उल्लेखित है। सोमवार के व्रत में व्यक्ति को सूर्योदय होने से पहले उठकर प्रातः स्नान कर शिव जी को जल चढ़ाना चाहिए। तथा शिव – पार्वती की पूजा करनी चाहिए | पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए। इसके बाद केवल एक समय भोजन करना चाहिए। साधारणतया सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर तक होता है | यानी शाम तक रखा जाता है |

 सोमवार का व्रत तीन प्रकार का होता है –
 1. प्रति सोमवार व्रत
2. सोम्य प्रदोष व्रत
3. सोलह सोमवार का व्रत

इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि होती है| अग्नि पुराण के अनुसार चित्रा नक्षत्रयुक्त सोमवार से लगातार सात वध करने पर व्यक्ति को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है इसके अलावा 16 सोमवार व्रत अविवाहित कन्याओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता है सोमवार व्रत कथा भगवान शिव से संबंधित है, जैसा कि आप सभी लोग जानते होंगे सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा होती है| जो स्त्री और पुरुष सोमवार के दिन व्रत रखता है और इस कथा का पाठ करता है तो उसे मनोवांछित फल मिलता है|


वृत कथा इस प्रकार है :

एक नगर में साहूकार रहता था| वह बहुत अमीर था| उसके घर किसी भी चीज की कमी नहीं थी| लेकिन उसको कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वह बेहद परेशान और दुखी रहता था| पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था | पूरी श्रद्धा से शिवालय में जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था| उसकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर मां पार्वती ने भगवान शिव से कहा हे प्रभु इस साहूकार की मनोकामना पूर्ण कर दीजिए

पार्वती जी की इच्छा को जानकर भगवान शिव ने कहा हे पार्वती इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है| और जिसके भाग्य में जो होता है उसे भोगना ही पड़ता है| लेकिन मां पार्वती ने उसकी भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई माता पार्वती के आग्रह पर शिव जी ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया किंतु साथ ही यह भी कहा उसका बालक केवल 12 वर्ष ही जिएगा | माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रह रहा था इस बात को सुनकर साहूकार को ना तो खुशी हुई और ना ही गम पहले की भांति वह भगवान की पूजा मैं लगा रहा | कुछ समय के उपरांत साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और 9 महीने के बाद उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया जब वह बालक 11 वर्ष का हुआ तो साहूकार ने उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया। साहूकार ने अपनी साले अर्थात बालक के मामा को बुलाया और उसे बहुत सारा धन देकर कहा कि तुम इस बालक को काशी शिक्षा प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में जहां भी रुको वहां यज्ञ करते हुए जाना और साथ ही साथ ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देते हुए जाना | दोनों मामा भांजे जैसे कि साहूकार ने कहा था उसी के अनुसार जहां भी रुकते वहां यज्ञ करते और ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देते हुए काशी की तरफ जा रहे थे रास्ते में एक नगर पड़ा और उसी रात उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था | लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह हो रहा था वह एक आंख से काना था | राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र की का काना होने की बात छुपाने के लिए एक चाल चली | उसने साहूकार के पुत्र को देखकर सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बना कर राजकुमारी से विवाह करा दूं बाद में इसको बहुत सारा धन देकर विदा कर दूंगा | और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा | WordPress.com इसी तरह राजकुमार के पिता नहीं साहूकार के पुत्र को दूल्हे के वस्त्र पहना कर राजकुमारी से विवाह करा दिया लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार शख्स था उसे यह बात अनुचित और न्याय विरोधी लगी | उसने अवसर पाकर राजकुमारी के चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है| लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना है | विवाह के बाद वह तुम्हें ले जाएगा मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं | जब राजकुमारी ने अपनी चुन्नी पर लिखी बात पढी तो उसने यह बात अपने माता-पिता को बताई | इस बात को सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को उस राजकुमार के साथ विदा नहीं किया | जिससे वह बरात वापस चली गई दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया | उसी दिन लड़के की आयु 12 वर्ष हुई | लड़के ने अपने मामा से कहा मामा मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है यह बात कह कर लड़का अंदर जाकर सो गया | जैसा कि शिवजी का वरदान था कुछ ही क्षणों में साहूकार के लड़के के प्राण निकल गए | जब लड़के के मामा ने अपने भांजे को मृत पाया तो मामा ने विलाप शुरू कर दिया | संयोगवश शिवजी और पार्वती उधर से जा रहे थे | पार्वती जी ने भगवान से कहा प्राणनाथ यह किसी के विलाप के स्वर सहन नहीं हो रहे हैं | आप इस व्यक्ति का कष्ट अवश्य दूर करें जब शिव जी मृत बालक के समीप गए और बोले यह बालक उसी साहूकार का पुत्र है | जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है , तो इसके प्राण चले गए लेकिन माता पार्वती भाव विभोर हो गई और कहां की हे महादेव आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें | अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प तड़प कर मर जाएंगे माता पार्वती के इस तरह के आग्रह से भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया | शिव जी की कृपा से वह बालक जीवित हो गया जब मामा और भांजे शिक्षा समाप्त करके अपने नगर की तरफ चल दिए और रस्ते में उसी नगर में पहुंचे जहां उसका विवाह हुआ था | उस नगर में उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया | उस लड़के के ससुर ने उस को पहचान लिया और महल में ले जाकर उसका स्वागत किया और अपनी पुत्री को उसके साथ विदा कर दिया | इधर भूखे-प्यासे रह कर साहूकार और उसकी पत्नी अपने बेटे का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे उन्होंने प्रण रखा था कि अगर उनके बेटे का मृत्यु का समाचार आया तो वह अपने प्राण त्याग देंगे | लेकिन अपने बेटे का जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद खुश हुए उसी रात भगवान से उस व्यापारी के सपने में आकर कहा हे श्रेष्ठी ! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रत कथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। अर्थात जो कोई भी सोमवार का व्रत रखता है और कथा पढ़ता और सुनता है उसके सभी कष्ट दूर होते हैं| और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं|

Sunday, November 5, 2017

बृहस्पतिवार व्रत विधि एवं कथा


बृहस्पतिवार व्रत की विधि
भक्त बंधुओं एवं बहनो गुरुवार या बृहस्पतिवार की कथा कहने से पहले हम आपको बृहस्पतिवार के व्रत की विधि बताएँगे बृहस्पतिवार के दिन जो भी स्त्री या पुरुष व्रत करे उसको चाहिए की वो दिन में एक ही समय भोजन करे क्यों की बृहस्पतेश्वर भगवान का उस दिन पूजन होता है, भोजन पीले चने की दाल आदि का करें परन्तु नमक नहीं खाएं, पीले वस्त्र पहनें तथा भोजन में पीले ही फलों का प्रयोग करें, पीले चन्दन से पूजन करें, पूजन के बाद प्रेम पूर्वक गुरु महाराज की कथा सुननी चाहिए|
इस व्रत को करने से मन की इच्छाएं पूरी होती हैं और बृहस्पति महाराज प्रसन्न होते हैं| धन, विद्या, पुत्र तथा मनोवांक्षित फलों की प्राप्ति होती है परिवार में सुख और शांति रहती है इसीलिए ये व्रत सर्वश्रेष्ठ व अति फलदायक सब स्त्री और पुरुषों के लिए है इस व्रत में केले का पूजन करना चाहिए, कथा और पूजन के समय मन, कर्म तथा वचन से शुद्धः होकर जो इच्छा हो बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए उसकी इच्छाओं को बृहस्पति देव अवश्य पूर्ण करते हैं ऐसा मन में दृढ विश्वास रखना चाहिए|

अब आप बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुनिए
एक समय की बात है कि भारतवर्ष में एक राजा राज्य करता था वो बड़ा ही प्रतापी और दानी था नित्य प्रति मंदिर में दर्शन करने जाता था, ब्राम्हण और गुरुओं कि सेवा किया करता था उसके दरवाजे से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता था, वो प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था, हर एक दिन गरीबों की सहायता करता परन्तु ये सब बातें उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी वो न तो व्रत करती और ना ही एक पैसा किसी को दान में देती थी तथा राजा से भी ऐसा करने को मना किया करती थी|
एक समय की बात है कि राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे उस समय घर पर केवल रानी और दासी थी ठीक उसी समय गुरु बृहस्पति देव एक साधु का रूप धारण करके राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने गए, जब उन्होंने रानी से भिक्षा मांगी तो वो कहने लगी कि हे साधु महाराज मै इस दान और पुण्य से तंग आ गयी हूँ मेरे से तो घर का ही कार्य समाप्त नहीं होता इस कार्य के लिए तो मेरे पति देव ही बहुत हैं अब आप इस प्रकार कि कृपा करें कि ये सब धन नष्ट हो जाये तथा मै आराम से रह सकूँ, साधु बोलेहे देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो संतान और धन से कोई दुखी नहीं होता है इसको सभी चाहते हैं पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करता है अगर आपके पास धन अधिक है तो भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणो को दान दो धर्मशाला बनवाओ, कुआ, तालाब बावड़ी, बाग़, बगीचे आदि का निर्माण करवाओ तथा निर्धन मनुष्यों कि कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ और अनेकों यज्ञादि धर्म करो इस प्रकार के कर्मो से आपके कुल का और आपका नाम परलोक में सार्थक होगा एवं स्वर्ग कि प्राप्ति होगी| मगर वो रानी इन बातों से खुश नहीं हुई वो बोली हे साधु महाराज मुझे ऐसे धन कि भी आवश्यकता नहीं जिसको और मनुष्यो को दान दूँ तथा जिसको रखने सम्हालने में ही मेरा सारा समय बर्बाद हो जाये साधु ने कहा देवी तुम्हारी अगर ऐसी ही इच्छा है तो ऐसा ही होगा मै तुम्हे बताता हूँ वैसा ही करना बृहस्पतिवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से कहना वो हज़ामत करवाए, भोजन में मांस मदिरा का सेवन करना, कपडा धोबी के यहाँ धुलने देना इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा सब धन नष्ट हो जायेगा ये कहकर साधु महाराज वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए रानी ने साधु के कहे अनुसार वैसा ही किया और अभी तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उनकी समस्त धन संपत्ति नष्ट हो गयी और भोजन के लिए दोनों समय परिवार तरसने लगा तथा सांसारिक भोगो से दुखी रहने लगे तब वो राजा रानी से कहने लगा कि हे रानी तुम यहाँ रहो मै दूसरे देश को जाता हूँ क्यों कि मुझे यहाँ पर सभी मनुष्य जानते हैं इसीलिए यहाँ कोई कार्य भी नहीं कर सकता देश चोरी परदेस भीख बराबर है ऐसा कह कर राजा परदेस चला गया वहां जंगल में जाता और लकड़ी काट कर लता और शहर में बेचता इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा| इधर राजा के घर रानी और दासी दुखी रहने लगी किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन तो जल पीकर ही रह जाती एक समय रानी और दासी को सात दिन बिना भोजन के व्यतीत हो गए तो रानी ने अपनी दासी से कहा हे दासी यहाँ पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है वो बड़ी धनवान है तू उसके पास जा और पांच सेर बेसन मांग कर ला जिससे कुछ समय के लिए गुजरा हो जायेगा इस प्रकार रानी कि आज्ञा मान कर दासी रानी के बहन के पास गयी तो रानी की बहन उस समय पूजन कर रही थी क्यों की उस रोज़ बृहस्पतिवार का दिन था जब दासी ने रानी की बहन को देखा तो उससे बोली हे रानी मुझे तुम्हारी बहन ने भेजा है मेरे लिए पांच सेर बेसन देदो इस प्रकार दासी ने अनेक बार कहा परन्तु रानी ने कुछ उत्तर नहीं दिया क्यों की वो उस समय बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन रही थी, इस प्रकार जब दासी को किसी प्रकार का उत्तर नहीं मिला तो वो बहुत दुखी हुई और क्रोध भी आया और लौट कर अपने गाँव आ रानी के पास आ कर बोली हे रानी आपकी बहन बहुत ही धनस्त्री है वो छोटे लोगों से बात भी नहीं करती क्यों की मैंने उनसे कहा तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया फिर मै वापस चली आयी रानी बोली हे दासी इसमें उसका कोई दोष नहीं है जब बुरे दिन आते हैं तो कोई सहारा नहीं देता अच्छे बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा ये सब हमारे भाग्य का दोष है इधर उस रानी ने देखा की मेरी बहन की दासी आयी थी परन्तु मै उससे नहीं बोल पायी इससे वो बहुत दुखी होगी ये सोच कर कथा को सुन और विष्णु भगवान का पूजन समाप्त करके वो रानी अपनी बहन के घर चली गयी और जाकर अपनी बहन से कहने लगी हे बहन मै बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी तुम्हारी दासी गयी परन्तु जब तक कथा होती है तब तक न उठते हैं और न बोलते हैं इसलिए मै नहीं बोली अभी कहो तुम्हारी दासी क्यों आयी थी रानी की बहन ने कहा हे बहन हमारे यहाँ अनाज नहीं था वैसे तुमसे कोई बात छिपी तो नहीं है इसीलिए मैंने दासी को तुम्हारे पास पांच सेर बेसन लेने को भेजा था रानी बोली बहन देखो बृहस्पति भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं देखो शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो इस प्रकार का वचन जब रानी ने सुना तो वो घर के अंदर गयी वहां उसे एक घड़ा बेसन का भरा मिल गया तब तो वो रानी और दासी बहुत ही दुखी हुई और दासी रानी से कहने लगी हे रानी देखो वैसे जब हमको नहीं मिलता तो हम रोज़ ही व्रत करते हैं अगर इनसे व्रत की विधि और कथा पूछ ली जाये तो उसे हम भी किया करेंगे तब उस रानी ने अपनी बहन से पूछा की हे बहन मुझे भी बृहस्पतिवार के व्रत के बारे में बताओ मै भी ये व्रत करुँगी तब रानी की बहन ने बताया की इस व्रत में चना की दाल, मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलावें, पीला भोजन करें तथा कथा सुनें इस प्रकार करने से गुरु भगवान प्रसन्न होते हैं अन्न, पुत्र, धन देते है मनोकामना पूर्ण करते हैं इस प्रकार रानी और दासी दोनों ने निश्चय किया की बृहस्पति भगवान का पूजन जरूर करेंगे सात रोज बाद जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा, घुड़साल में जाकर चना, गुड़ बीन लायी तथा चने की दाल से केले की जड़ का तथा विष्णु भगवान का पूजन किया अब भोजन पीला कहा से आए बेचारी बड़ी दुखी हुई परन्तु उन्होंने व्रत किया था इस कारण से गुरु भगवान प्रसन्न होकर दो थालियों में सुन्दर पीला भोजन लेकर आये और दासी को देकर बोले हे दासी ये तुम्हारे और रानी के लिए भोजन है तुम दोनों कर लेना दासी भोजन पाकर बड़ी प्रसन्न हुई और रानी से बोली चलो रानी जी भोजन कर लो रानी को इस विषय में कुछ पता नहीं था इसलिए वो दासी से बोली तुही भोजन कर क्यों की तू हमारी व्यर्थ में ही हंसी उड़ाती है दासी बोली एक महात्मा भोजन दे गया है रानी कहने लगी वो भोजन तेरे ही लिए दे गया है तू ही भोजन कर दासी ने कहा वो महात्मा दो थालियों में हम दोनों के लिए भेजन दे गया है इसलिए हम और तुम दोनों ही साथ साथ भोजन करेंगी इस प्रकार रानी और दासी दोनों ने गुरु भगवान को नमस्कार करके भोजन प्रारम्भ किया अब वो प्रत्येक बृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और विष्णु भगवान का पूजन करने लगी, बृहस्पति भगवान की कृपा से रानी और दासी के पास धन हो गया तो रानी फिर उसी प्रकार से आलस्य करने लगी| तब दासी बोली देखो रानी तुम पहले इस प्रकार से आलस्य करती थी तुम्हे धन रखने में कष्ट होता था इस कारण सभी धन नष्ट हो गया अब गुरु भगवान की कृपा से फिर से धन मिला है तो फिर तुम्हे आलस्य होता है बड़ी मुसीबतों के बाद हमने ये धन पाया है इसलिए हमें दान और पुण्य करना चाहिए तथा भूखे मनुष्यों को भोजन करवाना चाहिए, प्याऊ लगवाने चाहिए, ब्राह्मणो को दान देना चाहिए, कुए, तालाब, बावड़ी, बाग़, बगीचे आदि का निर्माण करवाना चाहिए मंदिर और पाठशालाएं बनवा कर दान करना चाहिए कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाना चाहिए और धन को शुभ कार्यों में ही खर्च करना चाहिए जिससे तुम्हारे कुल का यश बढे तथा स्वर्ग प्राप्त हो और पितृ प्रसन्न होएं तब रानी ने इसी प्रकार के कर्म करने का निश्चय किया और कर्म करना प्रारम्भ किया तो काफी यश फैलने लगा एक दिन रानी और दासी विचार करने लगी न जाने राजा किस दशा में होंगे उनकी कोई खोज खबर नहीं है गुरु भगवान से उन्होंने प्रार्थना की और भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा हे राजा उठ तेरी रानी तुझको याद करती है अपने देश को चला जा राजा प्रातः काल उठा और विचार करने लगा स्त्री जाती खाने और पहनने की ही साथी होती है पर भगवान की आज्ञा मान कर वो अपने नगर के लिए चलने को तैयार हुआ लेकिन जब इससे पूर्व राजा परदेस चला गया था तो परदेस में दुखी रहने लगा प्रतिदिन जंगल में से लकड़ी बीन कर लता और उन्हें बेच कर अपने जीवन को बड़ी कठिनता से व्यतीत करता था एक दिन राजा दुखी हो अपनी पुरानी बातों को याद करके रोने लगा तब उस जंगल में बृहस्पति देव एक साधु के वेश में रूपधारण करके आए और राजा के पास आकर बोले  हे लकड़हारे तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में बैठे हो मुझको बताओ, ये सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया और साधु को वंदना कर बोला हे प्रभु आप सब कुछ जानने वाले हो इतना कह कर साधु को उसने अपनी संपूर्ण कहानी सुना दी, महात्मा दयालु होते हैं वो राजा से बोले हे राजा तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति देव का अपराध किया था जिस कारण तुम्हारी ये दशा हुई है अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो भगवन तुम्हे पहले से अधिक धन देगा  देखो तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पतिवार का व्रत प्रारम्भ कर दिया है और तुम भी मेरा कहा मान कर बृहस्पतिवार के दिन चना, गुड़ और जल को लोटे में डाल कर केला का पूजन करो फिर कथा कहो और सुनो भगवान तुम्हारी सब मनोकामना पूर्ण करेंगे साधु को प्रसन्न देख कर राजा बोला हे प्रभु मुझे लकड़ी बेच कर इतना पैसा नहीं मिलता की मै भोजन करने के उपरांत कुछ बचा सकूँ मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे की मै उसकी खबर मंगा सकूँ  मै ये व्रत तथा कथा कैसे करू व कहुँ मुझे कुछ भी मालूम नहीं है साधु ने कहा राजा तुम किसी बात की चिंता मत करो बृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर जाओ तुमको रोज से दोगुना धन प्राप्त होगा जिससे तुम भली भाती भोजन कर सकोगे तथा बृहस्पतिदेव के पूजा का सामान भी आ जायेगा इस व्रत को करने तथा कथा कहने की विधि के लिए मै तुम्हे एक दूसरी कथा सुनाता हूँ ध्यान से सुनना  प्राचीन कल में एक ब्राह्मण था वो बहुत ही निर्धन था उसके कोई भी संतान नहीं थी उसकी स्त्री बहुत ही मलिनता के साथ रहती थी वो न तो स्नान करती और न ही किसी देवता का पूजन करती प्रातःकाल उठते ही सर्वप्रथम भोजन करती बाद में कोई अन्य कार्य करती थी इससे ब्राह्मण देवता बड़े दुखी थे बेचारे बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला, भगवान की कृपा से ब्राह्मण की स्त्री को कन्या रूपी रत्न पैदा हुई और वो कन्या अपने पिता के घर में बड़ी होने लगी  वो बालिका प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप करने लगी हर बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी अपने पूजा पाठ को समाप्त करके पाठशाला जाती तो अपने मुठ्ठी में जौ भर के ले जाती और पाठशाला जाने के मार्ग में डालती जाती वही जौ स्वर्ण के हो जाते तो लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी एक दिन वो बालिका सुप में जौ को फटक कर साफ़ कर रही थी तभी उसकी माँ ने देखा और कहा सोने के जौ को फटकने के लिए सोने का सुप होना चाहिए, दूसरे दिन गुरुवार था इस कन्या ने व्रत रखा  और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा प्रभु मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की है मेरे लिए सोने का सुप दे दो बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली फिर रोज़ाना की तरह वो कन्या जौ फैलाती हुई जाने लगी और जब लौट के जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से उसे सोने का सुप मिला उसे वो घर ले आई और उससे वो जौ साफ़ करने लगी परन्तु उसकी माँ का वही ढंग रहा| एक दिन की बात है की वो कन्या सोने के सुप में जौ साफ़ कर रही थी उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला  इस कन्या के मुख और कार्य को देख कर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन और जल त्याग कर उदास होकर लेट गया राजा को जब इस बात का पता लगा तो अपने प्रधान मंत्रियों के साथ अपने पुत्र के पास गया और बोला बेटा तुम्हे किस बात का कष्ट है किसी ने अपमान किया है? अथवा कोई और कारण है? सो कहो मै वही कार्य करूँगा जिससे तुम्हे प्रसन्नता हो राजकुमार ने अपने पिता की बातें सुनी तो वो बोला मुझे आपकी कृपा से किसी भी बात का दुःख नहीं है न ही किसी ने मेरा अपमान किया है  परन्तु पिताजी मै उस लड़की के साथ विवाह करना चाहता हूँ जो सोने के सुप में जौ को साफ़ कर रही थी ये सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ा और बोला बेटा इस तरह की कन्या का पता तुम्ही लगाओ मै उस कन्या के साथ तुम्हारा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा राजकुमार ने उस लड़की के घर का पता बतलाया मंत्री उस लड़की के घर गए और ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ संपन्न हो गया, कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया  अब भोजन के लिए अन्न भी बड़ी मुश्किल से मिलता था एक दिन दुखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री के पास गए बेटी ने पिता की दुखी अवस्था को देखा और अपनी माँ का समाचार पूछा तब ब्राह्मण ने सभी हाल कहा कन्या ने बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया इस प्रकार ब्राह्मण का कुछ समय सुख पूर्वक व्यतीत हुआ कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहाँ गया और सभी हाल कहा तो लड़की बोली पिताजी आप माताजी को यहाँ लाओ मै उसे विधि बता दूंगी  जिससे गरीबी दूर हो जाएगी वो ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो पुत्री अपनी माँ को समझाने लगी माँ तुम प्रातःकाल उठ कर सर्वप्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो सब दरिद्रता दूर हो जाएगी परन्तु उसकी माँ ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठ कर फिर से अपने पुत्री और बच्चों का जूठन खाने लगी, एक दिन उसकी पुत्री को बहुत गुस्सा आया और एक रात कोठरी से सारा सामान निकाल दिया और अपनी माँ को उसमे बंद कर दिया प्रातःकाल उसमे से निकला तथा स्नानादि कराके पूजा पाठ  करवाया तो उसकी माँ की बुद्धि ठीक हो गयी और प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी इस व्रत के प्रभाव से उसकी माँ भी बहुत ही धनवान हो गयी और बृहस्पतिजी के प्रभाव से स्वर्ग को प्राप्त हुई तथा ब्राह्मण देवता भी इस लोक के सुख भोग कर स्वर्ग को प्राप्त हुए इस तरह कहानी कह कर साधु देवता राजा के यहाँ से लोप हो गए धीरे धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया राजा जंगल से लकड़ी काट कर किसी शहर में बेचने गया उसे उस दिन और दिनों से अधिक धन मिला  राजा ने चना गुड़ आदि लाकर बृहस्पतिवार का व्रत किया उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हो गए परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना वो भूल गया इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज़ हो गए, उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में ये घोसणा करा दी की कोई भी मनुष्य अपने घर भोजन न बनाये तथा आग भी ना जलाये समस्त लोग मेरे यहाँ भोजन करने आएं इस आज्ञा को जो भी नहीं मानेगा उसके लिए फांसी की सजा दी जाएगी  इस तरह की घोसणा संपूर्ण नगर में करवा दी गयी राजा के आज्ञा अनुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए लेकिन ये लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा इसलिए राजा अपने साथ घर लेकर गए और ले जा कर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूँटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था वो वहां पर नहीं दिखाई दिया रानी ने निश्चय किया की मेरा हार जरूर इसी मनुष्य ने चुराया है उसी समय सिपाहियों को बुलवाकर उसे जेल खाने में डलवा दिया जब राजा जेल खाने में गया तो बहुत दुखी होकर  विचार करने लगा की न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे ये दुःख प्राप्त हुआ है और उसी साधु को याद करने लगा जो की उसे जंगल में मिला था उसी समय तत्काल बृहस्पति देव साधु के रूप में प्रकट हो गए और उसकी दशा देख कर कहने लगे अरे मुर्ख तूने बृहस्पतिदेव की व्रत एवं कथा नहीं की इसी कारण तुम्हे दुःख प्राप्त हुआ है अब चिंता मत कर बृहस्पतिवार के दिन जेलखाने के दरवाज़े पर चार पैसे पड़े मिलेंगे उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे, बृहस्पतिवार के रोज़ उसे चार पैसे  पड़े मिले उन पैसों से बृहस्पतिदेव के लिए पूजा तथा व्रत के सामान की व्यवस्था कर उसने विधि पूर्वक पूजा तथा व्रत संपन्न किया उसी रात बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा के स्वप्न में आकर कहा हे राजन तुमने जिस आदमी को जेलखाने में बंद कर रखा है वह निर्दोष है, वो राजा है उसे छोड़ देना रानी का हार उसी खूँटी पर लटका हुआ है अगर तू ऐसा नहीं करेगा तो मै तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा इस तरह रात्रि के स्वप्न को देख कर राजा प्रातःकाल उठा और खूँटी पर हार लटका हुआ देख कर लकड़हारे को बुला कर क्षमा  मांगी तथा राजा को योग्य व सुन्दर वस्त्र और आभुषण देकर विदा किया साधु के आदेशानुसार राजा अपने नगर को चल दिया राजा जब नगर के निकट पहुंचा तो उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ नगर में पहले से अधिक बाग़, तालाब और कुँए तथा बहुत से धर्मशाला और मंदिर आदि बने हुए थे राजा ने पूछा की ये किसका बाग़ और धर्मशाला है? तब नगर के सब लोग कहने लगे ये सब रानी और उसकी दासी के हैं तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया जब रानी ने ये खबर सुनी की राजा आ रहे हैं  तो उसने दासी से कहा हे दासी देख राजा हमें कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे वो हमारी ऐसी हालत देख कर कही लौट न जाएं इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा आज्ञा अनुसार दासी दरवाज़े पर खड़ी हो गयी और जब राजा आये तो उन्हें अपने साथ ले आयी तब राजा ने क्रोध करके अपनी तलवार निकाली और पूछने लगे ये बताओ की ये धन तुम्हे कैसे प्राप्त हुआ है? तब उन्होंने कहा हमें ये सब धन बृहस्पतिदेव के व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है तब राजा ने निश्चय किया की सात रोज़ बाद तो सभी बृहस्पतिदेव की पूजा करते हैं  परन्तु मै रोज़ाना दिन में तीन बार कथा कहा करूँगा तथा रोज़ व्रत किया करूँगा अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बंधी रहती थी तथा दिन में तीन बार कथा करता एक रोज़ राजा ने विचार किया की चलो अपनी बहन के यहाँ हो आएं इस तरह निश्चय करके राजा अपने घोड़े पे सवार हो अपनी बहन के यहाँ चला गया मार्ग में उसने देखा की कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं उन्हें रोक कर राजा कहने लगा अरे भाइयों मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो वे बोले लो हमारा तो आदमी मर गया है और इसको अपनी कथा  की पड़ी है परन्तु कुछ लोग बोले अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी की मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गयी तो राम राम कह कर वह मनुष्य खड़ा हो गया| आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलता हुआ मिला राजा ने उसे देखा और उससे बोला अरे भैया तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो किसान बोला जब तक मै तेरी कथा सुनुँगा तब तक मै चार हरैया जोत लूंगा जा अपनी कथा किसी और को सुनाना इस तरह राजा आगे चलने लगा  राजा के हटते ही हुआ क्या की बैल पछाड़ खा कर गिर गए तथा किसान के पेट में बहुत ज़ोर से दर्द होने लगा उसी समय उसकी माँ किसान के लिए खाने को लेकर रोटी लायी उसने जब ये देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह सुनाया तो बुढ़िया दौड़ी दौड़ी उस घुड़सवार के पास गयी और उससे बोली मै तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चल कर ही कहना राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही जिसके सुनते ही वो बैल खड़े हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बंद हो गया  इन सबके पश्चात् राजा अपनी बहन के घर पहुंचा बहन ने भाई की खूब मेहमानी की दूसरे रोज़ राजा प्रातःकाल जगा तो वो देखने लगा सब लोग भोजन कर रहे हैं राजा ने अपनी बहन से कहा की ऐसा कोई मनुष्य है जिसने अभी तक भोजन नहीं किया हो मेरी बृहस्पृतिवार की कथा कहनी है बहन बोली हे भैया ये देश ऐसा ही है पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं बाद में अन्य काम करते हैं अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आऊं वो ऐसा कह कर देखने चली गयी परन्तु उसे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने भोजन न किया हो  उसके पश्चात् वह एक कुम्हार के घर गयी जिसका लड़का बीमार था उसे मालूम हुआ की उसके यहाँ तीन रोज़ से किसी ने भी भोजन नहीं किया है रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा तो वो तैयार हो गया राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुन कर उसका लड़का ठीक हो गया अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी| एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा की हे बहन हम अपने घर को जायेंगे तुम भी तैयार हो जाओ राजा की बहन ने अपनी सास से कहा सास बोली हां चली जा परन्तु अपने लड़को को  मत ले जाना क्यों की तेरे भाई के यहाँ कोई औलाद नहीं होती है| बहन ने अपने भाई से कहा भैया मै तो चलूंगी लेकिन कोई बालक नहीं जायेगा इस पर राजा बोला जब कोई बालक नहीं जायेगा तब तुम क्या करोगी बड़े दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया, राजा ने अपनी रानी से कहा हम निर्वंशी राजा हैं हमारा मुँह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि भी नहीं किया तब रानी बोली, प्रभु बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है हमें औलाद भी अवश्य देंगे उसी रात को बृहस्पति देव ने राजा को स्वप्न में कहा हे  राजा उठ सभी सोच को त्याग दे तेरी रानी गर्भ से है राजा को ये बात सुन कर बड़ी प्रसन्नता हुई तथा नववे महीने में उनके यहाँ एक सुन्दर सा पुत्र पैदा हुआ तब राजा बोला रानी स्त्री बिना भोजन के रह सकती है बिना कहे नहीं रह सकती तो जब मेरी बहन आये तो तुम उससे कुछ मत कहना रानी ने सुनकर हाँ कर दिया| जब राजा की बहन ने ये शुभ समाचार सुना तो वो बहुत खुश हो गयी तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई तभी रानी ने कहा घोड़ा चढ़ कर तो नहीं आई गधा चढ़ी आई राजा की बहन बोली भाई अगर  मै इस प्रकार न कहती तो तुम्हे औलाद कैसे मिलती बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं जैसी जिसकी मन में कामनाएं हैं सभी को पूर्ण करते हैं जो सद्धभावना पूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पड़ता है अथवा सुनता है और दुसरो को सुनाता है बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं भगवान बृहस्पतिदेव उसकी सदैव रक्षा करते हैं संसार में सद्भावना से भगवान जी का पूजन व व्रत सच्चे ह्रदय से करते हैं तो वो उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने  बृहस्पतिदेव जी की कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छाएं बृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की उसी प्रकार सच्चे मन से कथा सुनकर प्रसाद लेकर जाना चाहिए ह्रदय से बृहस्पतिदेव जी का मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए|

"बृहस्पतिदेव की जय हो"

इति बृहस्पतिवार व्रत कथा