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Monday, March 12, 2018

सोमवार व्रत विधि एवं कथा

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सोमवार का व्रत भगवान भोलेनाथ को समर्पित है | भगवान भोलेनाथ को त्रिदेवों में से एक माना जाता है | शिव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार के व्रत का प्रावधान है | माना जाता है अगर कोई व्यक्ति 16 सोमवार का व्रत पूरे विधि-विधान से करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। सोमवार व्रत विधि जैसा कि नारद पुराण में उल्लेखित है। सोमवार के व्रत में व्यक्ति को सूर्योदय होने से पहले उठकर प्रातः स्नान कर शिव जी को जल चढ़ाना चाहिए। तथा शिव – पार्वती की पूजा करनी चाहिए | पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए। इसके बाद केवल एक समय भोजन करना चाहिए। साधारणतया सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर तक होता है | यानी शाम तक रखा जाता है |

 सोमवार का व्रत तीन प्रकार का होता है –
 1. प्रति सोमवार व्रत
2. सोम्य प्रदोष व्रत
3. सोलह सोमवार का व्रत

इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि होती है| अग्नि पुराण के अनुसार चित्रा नक्षत्रयुक्त सोमवार से लगातार सात वध करने पर व्यक्ति को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है इसके अलावा 16 सोमवार व्रत अविवाहित कन्याओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता है सोमवार व्रत कथा भगवान शिव से संबंधित है, जैसा कि आप सभी लोग जानते होंगे सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा होती है| जो स्त्री और पुरुष सोमवार के दिन व्रत रखता है और इस कथा का पाठ करता है तो उसे मनोवांछित फल मिलता है|


वृत कथा इस प्रकार है :

एक नगर में साहूकार रहता था| वह बहुत अमीर था| उसके घर किसी भी चीज की कमी नहीं थी| लेकिन उसको कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वह बेहद परेशान और दुखी रहता था| पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था | पूरी श्रद्धा से शिवालय में जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था| उसकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर मां पार्वती ने भगवान शिव से कहा हे प्रभु इस साहूकार की मनोकामना पूर्ण कर दीजिए

पार्वती जी की इच्छा को जानकर भगवान शिव ने कहा हे पार्वती इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है| और जिसके भाग्य में जो होता है उसे भोगना ही पड़ता है| लेकिन मां पार्वती ने उसकी भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई माता पार्वती के आग्रह पर शिव जी ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया किंतु साथ ही यह भी कहा उसका बालक केवल 12 वर्ष ही जिएगा | माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रह रहा था इस बात को सुनकर साहूकार को ना तो खुशी हुई और ना ही गम पहले की भांति वह भगवान की पूजा मैं लगा रहा | कुछ समय के उपरांत साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और 9 महीने के बाद उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया जब वह बालक 11 वर्ष का हुआ तो साहूकार ने उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया। साहूकार ने अपनी साले अर्थात बालक के मामा को बुलाया और उसे बहुत सारा धन देकर कहा कि तुम इस बालक को काशी शिक्षा प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में जहां भी रुको वहां यज्ञ करते हुए जाना और साथ ही साथ ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देते हुए जाना | दोनों मामा भांजे जैसे कि साहूकार ने कहा था उसी के अनुसार जहां भी रुकते वहां यज्ञ करते और ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देते हुए काशी की तरफ जा रहे थे रास्ते में एक नगर पड़ा और उसी रात उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था | लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह हो रहा था वह एक आंख से काना था | राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र की का काना होने की बात छुपाने के लिए एक चाल चली | उसने साहूकार के पुत्र को देखकर सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बना कर राजकुमारी से विवाह करा दूं बाद में इसको बहुत सारा धन देकर विदा कर दूंगा | और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा | WordPress.com इसी तरह राजकुमार के पिता नहीं साहूकार के पुत्र को दूल्हे के वस्त्र पहना कर राजकुमारी से विवाह करा दिया लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार शख्स था उसे यह बात अनुचित और न्याय विरोधी लगी | उसने अवसर पाकर राजकुमारी के चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है| लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हारा विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना है | विवाह के बाद वह तुम्हें ले जाएगा मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं | जब राजकुमारी ने अपनी चुन्नी पर लिखी बात पढी तो उसने यह बात अपने माता-पिता को बताई | इस बात को सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को उस राजकुमार के साथ विदा नहीं किया | जिससे वह बरात वापस चली गई दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया | उसी दिन लड़के की आयु 12 वर्ष हुई | लड़के ने अपने मामा से कहा मामा मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है यह बात कह कर लड़का अंदर जाकर सो गया | जैसा कि शिवजी का वरदान था कुछ ही क्षणों में साहूकार के लड़के के प्राण निकल गए | जब लड़के के मामा ने अपने भांजे को मृत पाया तो मामा ने विलाप शुरू कर दिया | संयोगवश शिवजी और पार्वती उधर से जा रहे थे | पार्वती जी ने भगवान से कहा प्राणनाथ यह किसी के विलाप के स्वर सहन नहीं हो रहे हैं | आप इस व्यक्ति का कष्ट अवश्य दूर करें जब शिव जी मृत बालक के समीप गए और बोले यह बालक उसी साहूकार का पुत्र है | जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है , तो इसके प्राण चले गए लेकिन माता पार्वती भाव विभोर हो गई और कहां की हे महादेव आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें | अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प तड़प कर मर जाएंगे माता पार्वती के इस तरह के आग्रह से भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया | शिव जी की कृपा से वह बालक जीवित हो गया जब मामा और भांजे शिक्षा समाप्त करके अपने नगर की तरफ चल दिए और रस्ते में उसी नगर में पहुंचे जहां उसका विवाह हुआ था | उस नगर में उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया | उस लड़के के ससुर ने उस को पहचान लिया और महल में ले जाकर उसका स्वागत किया और अपनी पुत्री को उसके साथ विदा कर दिया | इधर भूखे-प्यासे रह कर साहूकार और उसकी पत्नी अपने बेटे का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे उन्होंने प्रण रखा था कि अगर उनके बेटे का मृत्यु का समाचार आया तो वह अपने प्राण त्याग देंगे | लेकिन अपने बेटे का जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद खुश हुए उसी रात भगवान से उस व्यापारी के सपने में आकर कहा हे श्रेष्ठी ! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रत कथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। अर्थात जो कोई भी सोमवार का व्रत रखता है और कथा पढ़ता और सुनता है उसके सभी कष्ट दूर होते हैं| और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं|

Sunday, November 5, 2017

बृहस्पतिवार व्रत विधि एवं कथा


बृहस्पतिवार व्रत की विधि
भक्त बंधुओं एवं बहनो गुरुवार या बृहस्पतिवार की कथा कहने से पहले हम आपको बृहस्पतिवार के व्रत की विधि बताएँगे बृहस्पतिवार के दिन जो भी स्त्री या पुरुष व्रत करे उसको चाहिए की वो दिन में एक ही समय भोजन करे क्यों की बृहस्पतेश्वर भगवान का उस दिन पूजन होता है, भोजन पीले चने की दाल आदि का करें परन्तु नमक नहीं खाएं, पीले वस्त्र पहनें तथा भोजन में पीले ही फलों का प्रयोग करें, पीले चन्दन से पूजन करें, पूजन के बाद प्रेम पूर्वक गुरु महाराज की कथा सुननी चाहिए|
इस व्रत को करने से मन की इच्छाएं पूरी होती हैं और बृहस्पति महाराज प्रसन्न होते हैं| धन, विद्या, पुत्र तथा मनोवांक्षित फलों की प्राप्ति होती है परिवार में सुख और शांति रहती है इसीलिए ये व्रत सर्वश्रेष्ठ व अति फलदायक सब स्त्री और पुरुषों के लिए है इस व्रत में केले का पूजन करना चाहिए, कथा और पूजन के समय मन, कर्म तथा वचन से शुद्धः होकर जो इच्छा हो बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए उसकी इच्छाओं को बृहस्पति देव अवश्य पूर्ण करते हैं ऐसा मन में दृढ विश्वास रखना चाहिए|

अब आप बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुनिए
एक समय की बात है कि भारतवर्ष में एक राजा राज्य करता था वो बड़ा ही प्रतापी और दानी था नित्य प्रति मंदिर में दर्शन करने जाता था, ब्राम्हण और गुरुओं कि सेवा किया करता था उसके दरवाजे से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता था, वो प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था, हर एक दिन गरीबों की सहायता करता परन्तु ये सब बातें उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी वो न तो व्रत करती और ना ही एक पैसा किसी को दान में देती थी तथा राजा से भी ऐसा करने को मना किया करती थी|
एक समय की बात है कि राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे उस समय घर पर केवल रानी और दासी थी ठीक उसी समय गुरु बृहस्पति देव एक साधु का रूप धारण करके राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने गए, जब उन्होंने रानी से भिक्षा मांगी तो वो कहने लगी कि हे साधु महाराज मै इस दान और पुण्य से तंग आ गयी हूँ मेरे से तो घर का ही कार्य समाप्त नहीं होता इस कार्य के लिए तो मेरे पति देव ही बहुत हैं अब आप इस प्रकार कि कृपा करें कि ये सब धन नष्ट हो जाये तथा मै आराम से रह सकूँ, साधु बोलेहे देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो संतान और धन से कोई दुखी नहीं होता है इसको सभी चाहते हैं पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करता है अगर आपके पास धन अधिक है तो भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणो को दान दो धर्मशाला बनवाओ, कुआ, तालाब बावड़ी, बाग़, बगीचे आदि का निर्माण करवाओ तथा निर्धन मनुष्यों कि कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ और अनेकों यज्ञादि धर्म करो इस प्रकार के कर्मो से आपके कुल का और आपका नाम परलोक में सार्थक होगा एवं स्वर्ग कि प्राप्ति होगी| मगर वो रानी इन बातों से खुश नहीं हुई वो बोली हे साधु महाराज मुझे ऐसे धन कि भी आवश्यकता नहीं जिसको और मनुष्यो को दान दूँ तथा जिसको रखने सम्हालने में ही मेरा सारा समय बर्बाद हो जाये साधु ने कहा देवी तुम्हारी अगर ऐसी ही इच्छा है तो ऐसा ही होगा मै तुम्हे बताता हूँ वैसा ही करना बृहस्पतिवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से कहना वो हज़ामत करवाए, भोजन में मांस मदिरा का सेवन करना, कपडा धोबी के यहाँ धुलने देना इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा सब धन नष्ट हो जायेगा ये कहकर साधु महाराज वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए रानी ने साधु के कहे अनुसार वैसा ही किया और अभी तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उनकी समस्त धन संपत्ति नष्ट हो गयी और भोजन के लिए दोनों समय परिवार तरसने लगा तथा सांसारिक भोगो से दुखी रहने लगे तब वो राजा रानी से कहने लगा कि हे रानी तुम यहाँ रहो मै दूसरे देश को जाता हूँ क्यों कि मुझे यहाँ पर सभी मनुष्य जानते हैं इसीलिए यहाँ कोई कार्य भी नहीं कर सकता देश चोरी परदेस भीख बराबर है ऐसा कह कर राजा परदेस चला गया वहां जंगल में जाता और लकड़ी काट कर लता और शहर में बेचता इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा| इधर राजा के घर रानी और दासी दुखी रहने लगी किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन तो जल पीकर ही रह जाती एक समय रानी और दासी को सात दिन बिना भोजन के व्यतीत हो गए तो रानी ने अपनी दासी से कहा हे दासी यहाँ पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है वो बड़ी धनवान है तू उसके पास जा और पांच सेर बेसन मांग कर ला जिससे कुछ समय के लिए गुजरा हो जायेगा इस प्रकार रानी कि आज्ञा मान कर दासी रानी के बहन के पास गयी तो रानी की बहन उस समय पूजन कर रही थी क्यों की उस रोज़ बृहस्पतिवार का दिन था जब दासी ने रानी की बहन को देखा तो उससे बोली हे रानी मुझे तुम्हारी बहन ने भेजा है मेरे लिए पांच सेर बेसन देदो इस प्रकार दासी ने अनेक बार कहा परन्तु रानी ने कुछ उत्तर नहीं दिया क्यों की वो उस समय बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन रही थी, इस प्रकार जब दासी को किसी प्रकार का उत्तर नहीं मिला तो वो बहुत दुखी हुई और क्रोध भी आया और लौट कर अपने गाँव आ रानी के पास आ कर बोली हे रानी आपकी बहन बहुत ही धनस्त्री है वो छोटे लोगों से बात भी नहीं करती क्यों की मैंने उनसे कहा तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया फिर मै वापस चली आयी रानी बोली हे दासी इसमें उसका कोई दोष नहीं है जब बुरे दिन आते हैं तो कोई सहारा नहीं देता अच्छे बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा ये सब हमारे भाग्य का दोष है इधर उस रानी ने देखा की मेरी बहन की दासी आयी थी परन्तु मै उससे नहीं बोल पायी इससे वो बहुत दुखी होगी ये सोच कर कथा को सुन और विष्णु भगवान का पूजन समाप्त करके वो रानी अपनी बहन के घर चली गयी और जाकर अपनी बहन से कहने लगी हे बहन मै बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी तुम्हारी दासी गयी परन्तु जब तक कथा होती है तब तक न उठते हैं और न बोलते हैं इसलिए मै नहीं बोली अभी कहो तुम्हारी दासी क्यों आयी थी रानी की बहन ने कहा हे बहन हमारे यहाँ अनाज नहीं था वैसे तुमसे कोई बात छिपी तो नहीं है इसीलिए मैंने दासी को तुम्हारे पास पांच सेर बेसन लेने को भेजा था रानी बोली बहन देखो बृहस्पति भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं देखो शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो इस प्रकार का वचन जब रानी ने सुना तो वो घर के अंदर गयी वहां उसे एक घड़ा बेसन का भरा मिल गया तब तो वो रानी और दासी बहुत ही दुखी हुई और दासी रानी से कहने लगी हे रानी देखो वैसे जब हमको नहीं मिलता तो हम रोज़ ही व्रत करते हैं अगर इनसे व्रत की विधि और कथा पूछ ली जाये तो उसे हम भी किया करेंगे तब उस रानी ने अपनी बहन से पूछा की हे बहन मुझे भी बृहस्पतिवार के व्रत के बारे में बताओ मै भी ये व्रत करुँगी तब रानी की बहन ने बताया की इस व्रत में चना की दाल, मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलावें, पीला भोजन करें तथा कथा सुनें इस प्रकार करने से गुरु भगवान प्रसन्न होते हैं अन्न, पुत्र, धन देते है मनोकामना पूर्ण करते हैं इस प्रकार रानी और दासी दोनों ने निश्चय किया की बृहस्पति भगवान का पूजन जरूर करेंगे सात रोज बाद जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा, घुड़साल में जाकर चना, गुड़ बीन लायी तथा चने की दाल से केले की जड़ का तथा विष्णु भगवान का पूजन किया अब भोजन पीला कहा से आए बेचारी बड़ी दुखी हुई परन्तु उन्होंने व्रत किया था इस कारण से गुरु भगवान प्रसन्न होकर दो थालियों में सुन्दर पीला भोजन लेकर आये और दासी को देकर बोले हे दासी ये तुम्हारे और रानी के लिए भोजन है तुम दोनों कर लेना दासी भोजन पाकर बड़ी प्रसन्न हुई और रानी से बोली चलो रानी जी भोजन कर लो रानी को इस विषय में कुछ पता नहीं था इसलिए वो दासी से बोली तुही भोजन कर क्यों की तू हमारी व्यर्थ में ही हंसी उड़ाती है दासी बोली एक महात्मा भोजन दे गया है रानी कहने लगी वो भोजन तेरे ही लिए दे गया है तू ही भोजन कर दासी ने कहा वो महात्मा दो थालियों में हम दोनों के लिए भेजन दे गया है इसलिए हम और तुम दोनों ही साथ साथ भोजन करेंगी इस प्रकार रानी और दासी दोनों ने गुरु भगवान को नमस्कार करके भोजन प्रारम्भ किया अब वो प्रत्येक बृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और विष्णु भगवान का पूजन करने लगी, बृहस्पति भगवान की कृपा से रानी और दासी के पास धन हो गया तो रानी फिर उसी प्रकार से आलस्य करने लगी| तब दासी बोली देखो रानी तुम पहले इस प्रकार से आलस्य करती थी तुम्हे धन रखने में कष्ट होता था इस कारण सभी धन नष्ट हो गया अब गुरु भगवान की कृपा से फिर से धन मिला है तो फिर तुम्हे आलस्य होता है बड़ी मुसीबतों के बाद हमने ये धन पाया है इसलिए हमें दान और पुण्य करना चाहिए तथा भूखे मनुष्यों को भोजन करवाना चाहिए, प्याऊ लगवाने चाहिए, ब्राह्मणो को दान देना चाहिए, कुए, तालाब, बावड़ी, बाग़, बगीचे आदि का निर्माण करवाना चाहिए मंदिर और पाठशालाएं बनवा कर दान करना चाहिए कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाना चाहिए और धन को शुभ कार्यों में ही खर्च करना चाहिए जिससे तुम्हारे कुल का यश बढे तथा स्वर्ग प्राप्त हो और पितृ प्रसन्न होएं तब रानी ने इसी प्रकार के कर्म करने का निश्चय किया और कर्म करना प्रारम्भ किया तो काफी यश फैलने लगा एक दिन रानी और दासी विचार करने लगी न जाने राजा किस दशा में होंगे उनकी कोई खोज खबर नहीं है गुरु भगवान से उन्होंने प्रार्थना की और भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा हे राजा उठ तेरी रानी तुझको याद करती है अपने देश को चला जा राजा प्रातः काल उठा और विचार करने लगा स्त्री जाती खाने और पहनने की ही साथी होती है पर भगवान की आज्ञा मान कर वो अपने नगर के लिए चलने को तैयार हुआ लेकिन जब इससे पूर्व राजा परदेस चला गया था तो परदेस में दुखी रहने लगा प्रतिदिन जंगल में से लकड़ी बीन कर लता और उन्हें बेच कर अपने जीवन को बड़ी कठिनता से व्यतीत करता था एक दिन राजा दुखी हो अपनी पुरानी बातों को याद करके रोने लगा तब उस जंगल में बृहस्पति देव एक साधु के वेश में रूपधारण करके आए और राजा के पास आकर बोले  हे लकड़हारे तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में बैठे हो मुझको बताओ, ये सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया और साधु को वंदना कर बोला हे प्रभु आप सब कुछ जानने वाले हो इतना कह कर साधु को उसने अपनी संपूर्ण कहानी सुना दी, महात्मा दयालु होते हैं वो राजा से बोले हे राजा तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति देव का अपराध किया था जिस कारण तुम्हारी ये दशा हुई है अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो भगवन तुम्हे पहले से अधिक धन देगा  देखो तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पतिवार का व्रत प्रारम्भ कर दिया है और तुम भी मेरा कहा मान कर बृहस्पतिवार के दिन चना, गुड़ और जल को लोटे में डाल कर केला का पूजन करो फिर कथा कहो और सुनो भगवान तुम्हारी सब मनोकामना पूर्ण करेंगे साधु को प्रसन्न देख कर राजा बोला हे प्रभु मुझे लकड़ी बेच कर इतना पैसा नहीं मिलता की मै भोजन करने के उपरांत कुछ बचा सकूँ मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे की मै उसकी खबर मंगा सकूँ  मै ये व्रत तथा कथा कैसे करू व कहुँ मुझे कुछ भी मालूम नहीं है साधु ने कहा राजा तुम किसी बात की चिंता मत करो बृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर जाओ तुमको रोज से दोगुना धन प्राप्त होगा जिससे तुम भली भाती भोजन कर सकोगे तथा बृहस्पतिदेव के पूजा का सामान भी आ जायेगा इस व्रत को करने तथा कथा कहने की विधि के लिए मै तुम्हे एक दूसरी कथा सुनाता हूँ ध्यान से सुनना  प्राचीन कल में एक ब्राह्मण था वो बहुत ही निर्धन था उसके कोई भी संतान नहीं थी उसकी स्त्री बहुत ही मलिनता के साथ रहती थी वो न तो स्नान करती और न ही किसी देवता का पूजन करती प्रातःकाल उठते ही सर्वप्रथम भोजन करती बाद में कोई अन्य कार्य करती थी इससे ब्राह्मण देवता बड़े दुखी थे बेचारे बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला, भगवान की कृपा से ब्राह्मण की स्त्री को कन्या रूपी रत्न पैदा हुई और वो कन्या अपने पिता के घर में बड़ी होने लगी  वो बालिका प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप करने लगी हर बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी अपने पूजा पाठ को समाप्त करके पाठशाला जाती तो अपने मुठ्ठी में जौ भर के ले जाती और पाठशाला जाने के मार्ग में डालती जाती वही जौ स्वर्ण के हो जाते तो लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी एक दिन वो बालिका सुप में जौ को फटक कर साफ़ कर रही थी तभी उसकी माँ ने देखा और कहा सोने के जौ को फटकने के लिए सोने का सुप होना चाहिए, दूसरे दिन गुरुवार था इस कन्या ने व्रत रखा  और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा प्रभु मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की है मेरे लिए सोने का सुप दे दो बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली फिर रोज़ाना की तरह वो कन्या जौ फैलाती हुई जाने लगी और जब लौट के जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से उसे सोने का सुप मिला उसे वो घर ले आई और उससे वो जौ साफ़ करने लगी परन्तु उसकी माँ का वही ढंग रहा| एक दिन की बात है की वो कन्या सोने के सुप में जौ साफ़ कर रही थी उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला  इस कन्या के मुख और कार्य को देख कर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन और जल त्याग कर उदास होकर लेट गया राजा को जब इस बात का पता लगा तो अपने प्रधान मंत्रियों के साथ अपने पुत्र के पास गया और बोला बेटा तुम्हे किस बात का कष्ट है किसी ने अपमान किया है? अथवा कोई और कारण है? सो कहो मै वही कार्य करूँगा जिससे तुम्हे प्रसन्नता हो राजकुमार ने अपने पिता की बातें सुनी तो वो बोला मुझे आपकी कृपा से किसी भी बात का दुःख नहीं है न ही किसी ने मेरा अपमान किया है  परन्तु पिताजी मै उस लड़की के साथ विवाह करना चाहता हूँ जो सोने के सुप में जौ को साफ़ कर रही थी ये सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ा और बोला बेटा इस तरह की कन्या का पता तुम्ही लगाओ मै उस कन्या के साथ तुम्हारा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा राजकुमार ने उस लड़की के घर का पता बतलाया मंत्री उस लड़की के घर गए और ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ संपन्न हो गया, कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया  अब भोजन के लिए अन्न भी बड़ी मुश्किल से मिलता था एक दिन दुखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री के पास गए बेटी ने पिता की दुखी अवस्था को देखा और अपनी माँ का समाचार पूछा तब ब्राह्मण ने सभी हाल कहा कन्या ने बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया इस प्रकार ब्राह्मण का कुछ समय सुख पूर्वक व्यतीत हुआ कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहाँ गया और सभी हाल कहा तो लड़की बोली पिताजी आप माताजी को यहाँ लाओ मै उसे विधि बता दूंगी  जिससे गरीबी दूर हो जाएगी वो ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो पुत्री अपनी माँ को समझाने लगी माँ तुम प्रातःकाल उठ कर सर्वप्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो सब दरिद्रता दूर हो जाएगी परन्तु उसकी माँ ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठ कर फिर से अपने पुत्री और बच्चों का जूठन खाने लगी, एक दिन उसकी पुत्री को बहुत गुस्सा आया और एक रात कोठरी से सारा सामान निकाल दिया और अपनी माँ को उसमे बंद कर दिया प्रातःकाल उसमे से निकला तथा स्नानादि कराके पूजा पाठ  करवाया तो उसकी माँ की बुद्धि ठीक हो गयी और प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी इस व्रत के प्रभाव से उसकी माँ भी बहुत ही धनवान हो गयी और बृहस्पतिजी के प्रभाव से स्वर्ग को प्राप्त हुई तथा ब्राह्मण देवता भी इस लोक के सुख भोग कर स्वर्ग को प्राप्त हुए इस तरह कहानी कह कर साधु देवता राजा के यहाँ से लोप हो गए धीरे धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया राजा जंगल से लकड़ी काट कर किसी शहर में बेचने गया उसे उस दिन और दिनों से अधिक धन मिला  राजा ने चना गुड़ आदि लाकर बृहस्पतिवार का व्रत किया उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हो गए परन्तु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना वो भूल गया इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज़ हो गए, उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में ये घोसणा करा दी की कोई भी मनुष्य अपने घर भोजन न बनाये तथा आग भी ना जलाये समस्त लोग मेरे यहाँ भोजन करने आएं इस आज्ञा को जो भी नहीं मानेगा उसके लिए फांसी की सजा दी जाएगी  इस तरह की घोसणा संपूर्ण नगर में करवा दी गयी राजा के आज्ञा अनुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए लेकिन ये लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा इसलिए राजा अपने साथ घर लेकर गए और ले जा कर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूँटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था वो वहां पर नहीं दिखाई दिया रानी ने निश्चय किया की मेरा हार जरूर इसी मनुष्य ने चुराया है उसी समय सिपाहियों को बुलवाकर उसे जेल खाने में डलवा दिया जब राजा जेल खाने में गया तो बहुत दुखी होकर  विचार करने लगा की न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे ये दुःख प्राप्त हुआ है और उसी साधु को याद करने लगा जो की उसे जंगल में मिला था उसी समय तत्काल बृहस्पति देव साधु के रूप में प्रकट हो गए और उसकी दशा देख कर कहने लगे अरे मुर्ख तूने बृहस्पतिदेव की व्रत एवं कथा नहीं की इसी कारण तुम्हे दुःख प्राप्त हुआ है अब चिंता मत कर बृहस्पतिवार के दिन जेलखाने के दरवाज़े पर चार पैसे पड़े मिलेंगे उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे, बृहस्पतिवार के रोज़ उसे चार पैसे  पड़े मिले उन पैसों से बृहस्पतिदेव के लिए पूजा तथा व्रत के सामान की व्यवस्था कर उसने विधि पूर्वक पूजा तथा व्रत संपन्न किया उसी रात बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा के स्वप्न में आकर कहा हे राजन तुमने जिस आदमी को जेलखाने में बंद कर रखा है वह निर्दोष है, वो राजा है उसे छोड़ देना रानी का हार उसी खूँटी पर लटका हुआ है अगर तू ऐसा नहीं करेगा तो मै तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा इस तरह रात्रि के स्वप्न को देख कर राजा प्रातःकाल उठा और खूँटी पर हार लटका हुआ देख कर लकड़हारे को बुला कर क्षमा  मांगी तथा राजा को योग्य व सुन्दर वस्त्र और आभुषण देकर विदा किया साधु के आदेशानुसार राजा अपने नगर को चल दिया राजा जब नगर के निकट पहुंचा तो उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ नगर में पहले से अधिक बाग़, तालाब और कुँए तथा बहुत से धर्मशाला और मंदिर आदि बने हुए थे राजा ने पूछा की ये किसका बाग़ और धर्मशाला है? तब नगर के सब लोग कहने लगे ये सब रानी और उसकी दासी के हैं तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया जब रानी ने ये खबर सुनी की राजा आ रहे हैं  तो उसने दासी से कहा हे दासी देख राजा हमें कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे वो हमारी ऐसी हालत देख कर कही लौट न जाएं इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा आज्ञा अनुसार दासी दरवाज़े पर खड़ी हो गयी और जब राजा आये तो उन्हें अपने साथ ले आयी तब राजा ने क्रोध करके अपनी तलवार निकाली और पूछने लगे ये बताओ की ये धन तुम्हे कैसे प्राप्त हुआ है? तब उन्होंने कहा हमें ये सब धन बृहस्पतिदेव के व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है तब राजा ने निश्चय किया की सात रोज़ बाद तो सभी बृहस्पतिदेव की पूजा करते हैं  परन्तु मै रोज़ाना दिन में तीन बार कथा कहा करूँगा तथा रोज़ व्रत किया करूँगा अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बंधी रहती थी तथा दिन में तीन बार कथा करता एक रोज़ राजा ने विचार किया की चलो अपनी बहन के यहाँ हो आएं इस तरह निश्चय करके राजा अपने घोड़े पे सवार हो अपनी बहन के यहाँ चला गया मार्ग में उसने देखा की कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं उन्हें रोक कर राजा कहने लगा अरे भाइयों मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो वे बोले लो हमारा तो आदमी मर गया है और इसको अपनी कथा  की पड़ी है परन्तु कुछ लोग बोले अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी की मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गयी तो राम राम कह कर वह मनुष्य खड़ा हो गया| आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलता हुआ मिला राजा ने उसे देखा और उससे बोला अरे भैया तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो किसान बोला जब तक मै तेरी कथा सुनुँगा तब तक मै चार हरैया जोत लूंगा जा अपनी कथा किसी और को सुनाना इस तरह राजा आगे चलने लगा  राजा के हटते ही हुआ क्या की बैल पछाड़ खा कर गिर गए तथा किसान के पेट में बहुत ज़ोर से दर्द होने लगा उसी समय उसकी माँ किसान के लिए खाने को लेकर रोटी लायी उसने जब ये देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह सुनाया तो बुढ़िया दौड़ी दौड़ी उस घुड़सवार के पास गयी और उससे बोली मै तेरी कथा सुनूंगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चल कर ही कहना राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही जिसके सुनते ही वो बैल खड़े हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बंद हो गया  इन सबके पश्चात् राजा अपनी बहन के घर पहुंचा बहन ने भाई की खूब मेहमानी की दूसरे रोज़ राजा प्रातःकाल जगा तो वो देखने लगा सब लोग भोजन कर रहे हैं राजा ने अपनी बहन से कहा की ऐसा कोई मनुष्य है जिसने अभी तक भोजन नहीं किया हो मेरी बृहस्पृतिवार की कथा कहनी है बहन बोली हे भैया ये देश ऐसा ही है पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं बाद में अन्य काम करते हैं अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आऊं वो ऐसा कह कर देखने चली गयी परन्तु उसे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने भोजन न किया हो  उसके पश्चात् वह एक कुम्हार के घर गयी जिसका लड़का बीमार था उसे मालूम हुआ की उसके यहाँ तीन रोज़ से किसी ने भी भोजन नहीं किया है रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा तो वो तैयार हो गया राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुन कर उसका लड़का ठीक हो गया अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी| एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा की हे बहन हम अपने घर को जायेंगे तुम भी तैयार हो जाओ राजा की बहन ने अपनी सास से कहा सास बोली हां चली जा परन्तु अपने लड़को को  मत ले जाना क्यों की तेरे भाई के यहाँ कोई औलाद नहीं होती है| बहन ने अपने भाई से कहा भैया मै तो चलूंगी लेकिन कोई बालक नहीं जायेगा इस पर राजा बोला जब कोई बालक नहीं जायेगा तब तुम क्या करोगी बड़े दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया, राजा ने अपनी रानी से कहा हम निर्वंशी राजा हैं हमारा मुँह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि भी नहीं किया तब रानी बोली, प्रभु बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है हमें औलाद भी अवश्य देंगे उसी रात को बृहस्पति देव ने राजा को स्वप्न में कहा हे  राजा उठ सभी सोच को त्याग दे तेरी रानी गर्भ से है राजा को ये बात सुन कर बड़ी प्रसन्नता हुई तथा नववे महीने में उनके यहाँ एक सुन्दर सा पुत्र पैदा हुआ तब राजा बोला रानी स्त्री बिना भोजन के रह सकती है बिना कहे नहीं रह सकती तो जब मेरी बहन आये तो तुम उससे कुछ मत कहना रानी ने सुनकर हाँ कर दिया| जब राजा की बहन ने ये शुभ समाचार सुना तो वो बहुत खुश हो गयी तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ आई तभी रानी ने कहा घोड़ा चढ़ कर तो नहीं आई गधा चढ़ी आई राजा की बहन बोली भाई अगर  मै इस प्रकार न कहती तो तुम्हे औलाद कैसे मिलती बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं जैसी जिसकी मन में कामनाएं हैं सभी को पूर्ण करते हैं जो सद्धभावना पूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पड़ता है अथवा सुनता है और दुसरो को सुनाता है बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं भगवान बृहस्पतिदेव उसकी सदैव रक्षा करते हैं संसार में सद्भावना से भगवान जी का पूजन व व्रत सच्चे ह्रदय से करते हैं तो वो उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने  बृहस्पतिदेव जी की कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छाएं बृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की उसी प्रकार सच्चे मन से कथा सुनकर प्रसाद लेकर जाना चाहिए ह्रदय से बृहस्पतिदेव जी का मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए|

"बृहस्पतिदेव की जय हो"

इति बृहस्पतिवार व्रत कथा









Thursday, November 2, 2017

शुक्रवार व्रत विधि एवं कथा


व्रत की विधि
भक्त बहनों भाइयों, संतोषी माता की कथा प्रारंभ करने से पहले हम आपको संतोषी माता के व्रत की विधि बतायेंगे। सुख संतोष की देवी माँ संतोषी के पिता गणेश और माता रिध्धि-सिद्धि हैं | रिध्धि-सिद्धि धन, धान्य, सोना, चांदी, मूंगा, आदि रत्नो से भरा परिवार होने के कारण इन्हे प्रसन्नता, सुख-शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी भी माना गया है| सुख तथा सौभाग्य की कामना से माता संतोषी के 16 शुक्रवार तक व्रत किये जाने का विधान है|
संतोषी माता का लो नाम जिससे बन जाएं सारे काम, बोलो संतोषी माता की जय।
इस व्रत को करने वाला कथा कहते और सुनते समय हाथ में गुड़ और भुने हुए चने रखे तथा सुनने वाले संतोषी माता की जय इस प्रकार जय जयकार मुख से बोलते जाएंकथा समाप्त होने पर हाथ का गुड़ और चना गोमाता को खिलायें, कलश में रखा हुआ गुड़ चना सबको प्रसाद के रूप में बाँट दें, कथा से पहले कलश को जल से भर लें, उसके ऊपर गुड़ चने से भरा कटोरा रखें, कथा समाप्त तथा आरती करने के बाद
कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़कें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाल दें, सवा आने का गुड़ चना लेकर माता का व्रत करें सवा पैसे का भी गुड़ लें तो कोई आपत्ति नहीं, गुड़ घर में हो तो लें, विचार करें क्यों की माता भावना की भूखी हैं कम ज्यादा का कोई विचार नहीं इसलिए जितना भी बन पड़े श्रद्धा से अर्पण करें श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन होकर माता का व्रत करना चाहिए, व्रत के उद्यापन में अढ़ाई सेर खाझा, मोमनदार पूड़ी, खीर, चने का साग जरूर रखें...
घी का दीपक जला कर संतोषी माता की जय जयकार बोलें तथा नारियल फोड़ें। इस दिन घर में कोई खटाई खाये स्वयं खाएं और ही किसी दूसरे को खाने दें इस बात का ध्यान रखें, कुटुम्बी मिलें तो ब्राह्मणों के, रिश्तेदारों के या पड़ोसियों के बालक बुलायें, उन्हें खटाई की कोई वस्तु दें तथा भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दें, नगद पैसे दें बल्कि कोई वस्तु दक्षिणा में दें| व्रत करने वाला कथा सुन, प्रसाद ले एक समय भोजन करे, इससे माता प्रसन्न होगी, दुःख दरिद्रता दूर होगी तथा मनोकामना पूर्ण होगी|

माँ संतोषी के जन्म की कथा:
कहा जाता है कि एक बार रक्षाबंधन के त्यौहार पर भगवान् श्री गणेश अपनी बहन के साथ यह त्यौहार मना रहे थे, तभी उनके पुत्रों (शुभ तथा लाभ) ने भी इस त्यौहार को मानाने की बात कही और अपने पिता से एक बहन की मांग करने लगे| भगवान् श्री गणेश ने पहले तो मना कर दिया, परन्तु बाद में अपनी बहन, पत्नियों (रिध्धि-सिध्दि) और अपने पुत्रों के बार बार कहने पर उन्होंने एक कन्या प्रकट की तथा इस कन्या का नाम संतोषी रखा और इस प्रकार माँ संतोषी का जन्म हुआ|

माँ संतोषी का विवरण:
       पद                         : देवी
       पिता                       : भगवान् श्री गणेश
       माता                      : रिध्धि और सिद्धि
       भाई                        : शुभ और लाभ
       अस्त्र                       : तलवार, चावल से भरा हुआ सोने का पात्र और त्रिशूल
       सवारी                   : शेर
       आसन                   : कमल का फूल
  
माँ संतोषी के स्वरुप का वर्णन :
माँ संतोषी हमें केवल निर्मलता और शांति ही प्रदान नहीं करती बल्कि अपने सभी भक्तों की बुरी बलाओं से रक्षा करती हैं| उनके बायें हाथ में तलवार और दाएं हाथ में जो त्रिशूल है| वह इसी बात का प्रतीक है कि माता के भक्त उनके संरक्षण में हैं| ऐसी मान्यता है कि माता के चार हाथ हैं| अपने भक्तों के लिए तो उनके दो ही हाथ प्रकट रूप में हैं, परन्तु अन्य दो हाथ उन बुरी शक्तियों के लिए है, जो सच्चाई और अच्छाई के रास्ते में रूकावट पैदा करते हैं| माँ संतोषी का रूप बहुत ही शांत, सौम्य और सुन्दर है, जो भक्तों को मंत्र मुग्ध कर देता है

पूजा के लिए आवश्यक सामाग्री:
       माँ संतोषी का फोटो,
       प्रसाद के रूप में चना और गुड़,
       आरती के लिए कपूर, 
       कलश स्थापना के लिए नारियल,
       माता के फोटो कि स्थापना के लिए लकड़ी का टेबल,
       हल्दी मिली हुई पीली चावल
       कलश,
       अगरबत्ती,
       पान के पत्ते,
       फूल,
       दीपक,
       हल्दी,
       कुमकुम

माता संतोषी के पूजा की रीती-रिवाज़:

       माँ संतोषी की आराधना विशेष रूप से शुक्रवार के दिन की जाती है|
       इनकी अर्चना के लिए लगातार 16 शुक्रवार तक व्रत रखा जाता है और पूजा की जाती है|
       अंत में उद्यापन किया जाता है जिसमे की खट्टी चीज़ों का प्रयोग वर्ज़ित है| ऐसा करने से मनोवांक्षित फलों की प्राप्ति होती है|
       शुक्रवार के दिन प्रातः सिर से स्नानादि करके माता का फोट एक स्वच्छ देव स्थान पर रखते हैं और एक छोटे कलश की स्थापना करते हैं|
       अब माता का फोटो पुष्प इत्यादि से सुसज्जित करते हैं|
       अब चना (जो कम से कम 6 घंटे तक पानी में भीगा हो) अथवा बेंगल ग्राम के साथ गुड़ और केला प्रसाद के रूप में रखते हैं|
       अब फोटो के सामने दिया जलाते हैं, मंत्र का उच्चारण करते हैं, माता की आरती उतारते हैं और फिर प्रसाद ग्रहण किया जाता है|
       आप चाहें तो पूरा दिन उपवास रखें अथवा दिन में एक बार भोजन ग्रहण करें| परन्तु हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि आपको इस पुरे दिन में खट्टे खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना है|
       आपको यह संपूर्ण प्रक्रिया 16 शुक्रवारों तक करनी है और 16 शुक्रवार के पश्चात कार्य सिध्ध होने पर ही व्रत का उद्यापन करना है| जिसमे की आपको आठ बच्चों को भोजन करना है| परन्तु यहाँ भी इस बात का ध्यान रखें कि उन्हें कोई भी खट्टे पदार्थ खाने को दिए जाएं और ही उन्हें आप पैसे दें जिसका उपयोग वो खट्टे पदार्थ खाने में कर सकते हैं|



अब आप संतोषी माता के व्रत की कथा सुनिये
एक बुढ़िया थी और उसके सात बेटे थे, छः कमाने वाले थे और एक निकम्मा था| बुढ़िया माँ छहों पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो कुछ बचता वो सातवें को देती थी, परन्तु सातवाँ पुत्र बड़ा भोला भला था मन में कुछ विचार करता एक दिन वो अपनी पत्नी से बोला देखो मेरी माता का मुझ पर कितना प्रेम है वो बोली क्यों नहीं सबका जूठा बचा हुआ जो तुमको खिलाती है वो बोला ऐसा नहीं हो सकता मै जब तक आखों से नहीं देखूँ मान नहीं सकता, पत्नी ने हंस कर कहा देख लोगे तब तो मानोगे?
कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने, वो जांचने को सर में दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सर पर ओढ़ कर रसोई घर में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा, छहों भाई भोजन करने आये उसने देखा माँ ने उनके लिए सुन्दर सुन्दर आसन बिछाये सात प्रकार की रसोई परोसी वो आग्रह करके परोसती रही वो देखता रहा, छहों भाई भोजन कर उठे तब माँ ने उनकी जूठी थालियों में से लड्डुओं के बचे हुए टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया जूठन साफ़ कर बुढ़िया माँ ने पुकारा, उठ बेटा छहों भाई भोजन कर गये अब तू ही बाकी है उठ भोजन कर ले, वो कहने लगा माँ मुझे भोजन नहीं करना मै परदेश जा रहा हूँ, माता ने कहा कल जाना हो तो आज ही जा वो बोला हाँ हाँ जा रहा हूँ ये कह कर वो घर से निकल गया, चलते समय उसे पत्नी की याद आयी वो गौसाला में कंडे थाप रही थी, वह जाकर बोला मेरे पास तो कुछ नहीं ये अंगूठी है सो ले लो और अपनी कोई निशानी मुझे दो, वो बोली मेरे पास क्या है ये गोबर भरा हाथ है ये कहकर उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी और वो चल दिया, चलते चलते दूर देश में पहुंचा वहाँ पर एक साहूकार की दुकान थी वहाँ जाकर बोला सेठ जी मुझे नौकरी पर रख लो साहूकार को जरूरत थी साहूकार ने कहा काम देख कर दाम मिलेंगे| अब उसे साहूकार की नौकरी मिल गयी वो सवेरे सात बजे से बारह बजे रात तक काम करने लगा कुछ ही दिन में वो दुकान का लेन देन, हिसाब किताब, ग्राहकों को माल बेचना सारा काम करने लगा साहूकार के सात आठ नौकर थे वे सब चक्कर खाने लगे ये बहुत होशियार बन गया है!!!
सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में ही उसे मुनाफे का साझीदार बना लिया इस प्रकार बारह वर्ष में वो नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उस पर छोड़ कर बाहर चला गया|



इधर उसकी पत्नी पर क्या बीती सो सुनो सास ससुर उसे दुःख देने लगे सारी गृहस्ती का काम करा कर उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते इस बीच घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बना कर रख दी जाती और फूटे नारियल की नरेली में पानी दिया जाता इस तरह दिन बितते रहे एक दिन वो लकड़ी लेने जंगल की ओर जा रही थी कि रास्ते में बहुत सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं वह वहीं खड़ी होकर कहने लगी बहनों ये तुम किस देवता का व्रत करती हो  और इसके करने से क्या फल होता है? इस व्रत के करने की क्या विधि है? यदि तुम अपने इस व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मै तुम्हारा बड़ा एहसान मानूंगी, तब उनमें से एक स्त्री बोली, सुनो ये संतोषी माता का व्रत है इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती है, मन की चिंतायें दूर होती हैं घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है, निपुत्री को पुत्र मिलता है, प्रियतम बाहर गया हुआ हो तो शीघ्र आ जाता है, कुँवारी कन्या को मन पसंद वर मिलता है, कचहरी में बहुत दिनों से मुक़दमा चलता हो तो ख़त्म हो जाता है, कलह क्लेश की निवृति होती है, सुख शांति होती है, घर में धन जमा होता है, पैसा जायदाद का लाभ होता है तथा और भी मन में जो कुछ कामना हो सब संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जाती है इसमें कोई संदेह नहीं, वो पूछने लगी ये व्रत कैसे किया? जाये ये भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी, स्त्री कहने लगी सवा आने का गुड़ चना लेना इच्छा हो तो सवा पांच आने का लेना या सवा रुपये का भी सहूलियत अनुसार लेना, बिना परेशानी श्रद्धा और प्रेम से जितना भी बन सके सवाया ही लेना| सवा पांच पैसे से सवा पांच आने तथा इससे भी ज्यादा शक्ति और भक्ति अनुसार गुड़ और चना लेना, हर शुक्रवार को निराहार रह कथा कहना सुनना इसके बिच क्रम टूटे नहीं लगातार नियम का पालन करना, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो घी का दीपक जला उसके आगे जल के पात्र को रख कथा कहना, परन्तु नियम न टूटे, जब तक कार्य सिध्ध न हो नियम पालन करना और कार्य सिध्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना, तीन मास में माता पूरा फल प्रदान करती हैं यदि किसी के गृह खोटे भी हो तो भी माता एक वर्ष में अवश्य कार्य सिद्धः करती हैं, कार्य सिद्धः होने पर ही उद्यापन करना चाहिये बीच में नहीं, उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाझा तथा इसी अनुसार से खीर तथा चने का साग करना, आठ लड़कों को भोजन कराना, जहाँ तक मिले देवर, जेठ, भाई, बंधू, कुटुंब के लड़के लेना अगर न मिलें तो रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लड़के बुलाना उन्हें भोजन करा यथाशक्ति दक्षिणा दे माता का नियम पूरा करना, उस दिन घर में कोई भी खटाई न खाये इस बात का ध्यान रखना, ये सुन बुढ़िया की बहु चल दी, रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़ चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देख पूछने लगी, ये मंदिर किसका है? सब कहने लगे ये संतोषी माता का मंदिर है, ये सुन माता के मंदिर में जा माता के चरणों में लोटने लगी, विनती करने लगी, माँ मै दीन हूँ, निपट मुर्ख हूँ, व्रत के नियम कुछ जानती नहीं, मै बहुत दुखी हूँ| हे माता जग जननी मेरा दुःख दूर कर मैं तेरी शरण में हूँ| माता को दया आई, एक शुक्रवार बिता की दूसरे शुक्रवार को ही इसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा आ पहुंचा| ये सभी बातें देख कर जेठानी मुँह सिकोड़ने लगी और बोली इतने दिनों इतना पैसा आया इसमें क्या बड़ा है? लड़के ताने मारने लगे की काकी के पास अब पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी, अब तो काकी बुलाने से भी नहीं बोलेगी, बेचारी सरलता से कहती, भैया पत्र आये, रुपया आये तो हम सबके लिए अच्छा है ऐसा कह कर आँखों में आंसू भर कर संतोषी माता के मंदिर में आ मातेश्वरी के चरणों में गिर कर रोने लगी माँ मैंने तुमसे पैसा नहीं माँगा मुझे पैसे से क्या काम है? मुझे तो अपने सुहाग से काम है मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा मांगती हूँ तब माता ने प्रसन्न होकर कहा जा बेटी तेरा स्वामी आयेगा यह सुन खुशी से बावली हो घर जाकर काम करने लगी अब संतोषी माँ विचार करने लगी इस भोली पुत्री से मैंने कह तो दिया की तेरा पति आयेगा पर आयेगा कहा से? वो तो इसे स्वपन में भी याद नहीं करता इसे याद दिलाने तो मुझे ही जाना पड़ेगा| इस प्रकार माता उस बुढ़िया के बेटे के पास जा स्वपन में प्रकट हो कहने लगी साहूकार के बेटे सोता है या जागता है? वो बोला माता सोता भी नहीं हूँ जागता भी नहीं हूँ बीच में ही हूँ, कहिये क्या आज्ञा है? माँ कहने लगी तेरा घरबार है या नहीं? वो बोला सब कुछ है माता माँ, बाप, भाई, बहन, पत्नी, क्या कमी है? माँ बोली पुत्र तेरी घरवाली कष्ट उठा रही है वो बोला हाँ माँ ये तो मुझे मालूम है, परन्तु जाऊं कैसे? परदेश की बात है लेनदेन का कोई हिसाब नहीं, कोई जाने का रास्ता नज़र नहीं आता कैसे चला जाऊं? माँ कहने लगी मेरी बात मान, सवेरे नहा धो कर संतोषी माता का नाम ले घी का दीपक जला दंडवत कर दूकान पर जा बैठना देखते देखते तेरा सब लेनदेन चुक जायेगा, जमा माल बिक जायेगा शाम होते होते धन का ढेर लग जायेगा| अब तो वो सवेरे बहुत ही जल्दी उठ मित्र बंधुओं से अपने सपने की बात कहता है वे सब उसकी बात अनसुनी कर उसका मज़ाक उड़ाने लगे और बोले कही सपने भी सच्चे होते हैं? लेकिन उनमें से एक बूढ़ा बोला देखो भाई मेरी बात मान इस तरह साँच या झूठ कहने के बदले माता ने जैसा कहा है वैसा ही करना तेरा क्या जाता है? अब वह बूढ़े की बात मान कर नहा धो कर संतोषी माता को दण्डवत कर घी का दीपक जला दूकान पर जा बैठता है| थोड़ी देर में वो क्या देखता है!!! कि देने वाले रूपया लाये और लेने वाले हिसाब लाये, कोठे में भरे सामानों के खरीददार नगद दाम में सौदा करने लगे, शाम तक धन का ढेर लग गया, मन में माता का नाम ले, प्रसन्न हो घर जाने के वास्ते गहना, कपड़ा, सामान इत्यादि खरीदने लगा और इस तरह यहाँ के काम से निपट घर को रवाना हुआ|




वहाँ उसकी पत्नी बेचारी जंगल में लकड़ी लेने जाती है और लौटते समय माता जी के मंदिर पर विश्राम करती है, वो तो उसका रोज़ रुकने का स्थान ठहरा, दूर धुल उड़ती देख वो माता से पूछती है, हे माता ये धुल कैसी उड़ रही है? माँ कहती है पुत्री तेरा पति आ रहा है, अब तू ऐसा कर लकड़ियों के तीन बोझ बना एक नदी के किनारे रख, दूसरा मेरे मंदिर पर और तीसरा अपने सर पर रख, तेरे पति को लकड़ी का गठ्ठा देख मोह पैदा होगा... वो वहाँ रुकेगा नाश्ता, पानी बना खा कर माँ से मिलने जायेगा तू लकड़ी का बोझ उठा कर जाना और बीच आँगन में गठ्ठा डाल कर तीन आवाजें ज़ोर से लगाना...लो सासु जी लकड़ियों का गठ्ठा लो, भूसी कि रोटी दो और नारियल के खोपड़ी में पानी दो... आज कौन मेहमान आया है? माँ कि बात सुन कर उसने कहा बहुत अच्छा माता जी ऐसा कह कर मन प्रसन्न करके लकड़ियों के तीन गठ्ठे ले आई...एक नदी के तट पर, एक माता के मंदिर पर रखा तो इतने में ही वो मुसाफिर आ पहुंचा... सुखी लकड़ी देख उसकी इच्छा हुई कि अब यहीं निवास करें और भोजन बना खा पी कर गाँव चलें...इस प्रकार भोजन खा विश्राम कर गाँव को गया उसी समय उसकी पत्नी सर पर लकड़ी का गठ्ठा लिए आती है उसे आँगन में डाल कर ज़ोर से तीन आवाज़ें देती है... लो सासु जी लकड़ी का गठ्ठा लो, भूसी कि रोटी दो और नारियल के खोपड़े में पानी दो...आज कौन मेहमान आया है? ये सुन कर उसकी सास अपने दिए हुए कष्टों को भुलाने हेतु कहती है... बहु ऐसा क्यों कहती हो? तेरा मालिक ही तो आया है, बैठ मीठा भात खा कर कपडे गहने पहन| इतने में आवाज़ सुन कर उसका स्वामी बहार आता है और अंगूठी देख व्याकुल हो जाता है!!! माँ से पूछता है ये कौन है? माँ कहती है ये तेरी पत्नी है आज बारह वर्ष हो गए जब से तू गया है तब से सारे गाँव में जानवर कि तरह भटकती फिरती है, काम काज कुछ घर का करती नहीं और उल्टा चार समय आकर खा जाती है, अब तुझे देख कर भूसे कि रोटी और नारियल के खोपड़े में पानी मांगती है... वो लज्जित हो बोला ठीक है माँ मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी, अब मुझे दूसरे घर कि चाबी दो तो मैं उसमे रहूँगा| ठीक है बेटा जैसी तेरी मर्ज़ी ये कह कर माँ ने चाबियों का गुच्छा पटक दिया  उसने चाबियों का गुच्छा लेकर दूसरे कमरे का सारा सामान जमाया और साफ़ सफाई कर पूरा घर सजा डाला एक दिन में ही वहां राजा के महल जैसा ठाठ बाठ बन गया, अब क्या था वो दोनों पति पत्नी अब सुख भोगने लगे| इसके पश्चात् अगला शुक्रवार आया पत्नी ने अपने पति से कहा मुझे माँ संतोषी का उद्यापन करना है...उसका पति ये सुन कर बोला बहुत अच्छा खुशी से कर लो इसके तत्पश्चात ही वो उद्यापन कि तैयारी में लग गयी तथा जेठ के लड़के को भोजन के लिए कहने गयी और उसने मंज़ूर किया, परन्तु पीछे से जेठानी अपने बच्चों को सीखा देती है कि देखो रे भोजन के समय सब लोग खटाई खाने को मांगना जिससे कि इसका उद्यापन पूरा न हो लड़के भोजन करने आये और खीर पेट भर खाया परन्तु उनके माँ कि बात याद आते ही कहने लगे... हमें कुछ खटाई खाने को दो खीर खाना हमें भाता नहीं देख कर अरुचि होती है लड़के उठ खड़े हुए बोले पैसे लाओ, बेचारी भोली बहु कुछ जानती नहीं थी सो उसने उन्हें पैसे दे दिए| लड़के उसी समय उठ कर इमली लेकर खाने लगे ये देख कर माता जी ने कोप किया और तत्पश्चात ही उस नगर के राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गए अब तो बहु के जेठ जेठानी मनमानी ही खोटे वचन कहने लगे कि लूट लूट कर धन लाया था सो राजा के दूत उसे पकड़ कर ले गए हैं अब सब मालूम हो जायेगा जब जेल कि रोटी खायेगा, बहु से ये वचन सहन नहीं हुआ और वो रोती रोती माता के मंदिर में गयी और कहने लगी माता तुमने ये क्या किया? हँसा कर क्यों रुलाने लगी? माता बोली पुत्री तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया है इतनी जल्दी सब बातें भूला दी... वो कहने लगी माता भूली तो नहीं हूँ न कुछ अपराध किया है मुझे तो लड़कों ने भूल में डाल दिया... मैंने भूल से उन्हें पैसे दे दिये मुझे क्षमा करो माँ माँ बोली ऐसी भी कहीं भूल होती है? वो बोली माँ माफ़ कर दो मैं फिर से तुम्हारा उद्यापन करुँगी...तब माँ बोली कि अब भूल मत करना वो बोली हे माँ अब भूल नहीं होगी...अब कृपा करके बताओ कि मेरे पति कैसे आएंगे? माँ बोली पुत्री जा तेरा मालिक तुझे रास्ते में ही आता मिलेगा|



अभी जैसे ही वह निकली थी कि रास्ते में उसे उसका पति आता हुआ मिल गया... तब उसकी पत्नी ने अपने पति से पूछा कि तुम कहा चले गए थे? तो वो कहने लगा इतना धन जो कमाया है उसी का क़र राजा ने माँगा था वही भरने गया था तब वो प्रसन्न हो बोली कि भला हुआ अब घर चलो| कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार का दिन आया वो बोली मुझे माता का उद्यापन फिर से करना है तो उसके पति ने कहा ठीक है कर लो...इसके पश्चात् उसकी पत्नी फिर से जेठ के लड़कों को भोजन के लिए आमंत्रित करने गयी... जेठानी ने एक दो बातें सुनाई और अपने लड़कों को सीखा दिया कि तुम पहले ही खटाई माँगना लड़के भोजन के लिए गए और खाना प्रारम्भ करने से पहले ही कहने लगे कि हमें खीर खाना नहीं भाता जी बिगड़ता है कुछ खट्टा खाने को दो, बहु बोली खटाई खाने को नहीं मिलेगी खाना हो तो खीर खाओ यह कह कर ब्राह्मणो के लड़के बुला कर भोजन कराने लगी यथाशक्ति दक्षिणा के जगह पर एक एक फल उन्हें दिया इससे संतोषी माता प्रसन्न हुईं माता कि कृपा होते ही नवमे मास उसे चन्द्रमा के सामान सुन्दर सा पुत्र पैदा हुआ, पुत्र को लेकर वह प्रतिदिन माता के मंदिर जाती तब माँ ने सोचा कि रोज़ ये आती है आज क्यों न मैं ही उसके घर चलूँ? इसका आसरा देखूं तो सही ये विचार कर माता ने भयानक रूप बनाया गुड़ और चने से सना मुख ऊपर से सूंड के समान होंठ उस पर मख्खियां भिनभिना रही थीं ऐसा रूप माँ ने बनाया और उसके घर कि ओर चल दींउसके घर के देहलीज़ पर पैर रखते ही बहु की सास चिल्लाई देखो रे कोई चुड़ैल डाकिनी चली आ रही है, लड़कों इसे भगाओ नहीं तो सबको खा जायेगी... लड़के डरने लगे और चिल्ला कर खिड़की बंद करने लगे, बहु ये सब रोशनदान से देख रही थी वो प्रसन्नता से पगली होकर चिल्लाने लगी कि आज मेरी माता मेरे घर आयी है ये कह कर बच्चे को दूध पिलाने से हटा देती है इतने में ही उसकी सास का क्रोध फुट पड़ता है और कहती है देखो रे ये मुई  इस चुड़ैल को देख कर कैसे उतावली हुई जो कि बच्चे को पटक दिया इतने में माँ के प्रताप से जहाँ देखो वहां लड़के ही लड़के नज़र आने लगे बहु बोली माँ जी मैं जिनका व्रत करती हूँ ये वही संतोषी माता हैं इतना कहते ही उसने झट से घर के सारे किवाड़ खोल दिये
फिर सब ने माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे हे माता हम मुर्ख हैं, हम अज्ञानी हैं तुम्हारे व्रत कि विधि हम नहीं जानते, तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बड़ा अपराध किया है सो हे माता आप हमारे अपराध को क्षमा करो
इस प्रकार माता प्रसन्न हुईं और सबका कल्याण किया|

हे माता आपने जैसा फल बहु को दिया वैसा ही फल सबको प्रदान करो  तथा जो ये कथा सुने या पढ़े उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण हो...
हे भक्त बंधुओं सच्चे मन से बोलो
"संतोषी माता की जय"
इति संतोषी माता व्रत कथा

जय संतोषी माँ